नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-3
Posted by FNR on March 7, 2009
(पिछली पोस्ट से आगे)
बहुदलीय लोकतन्त्र की बहाली और 1992 के चुनाव में नेपाली कांग्रेस के सत्तासीन होने के तुरन्त बाद, पूरे देश में गम्भीर आर्थिक संकट की स्थिति थी। क़ीमतें आसमान छू रही थीं। भ्रष्टाचार चरम पर था। इस अनुकूल समय में ने.क.पा. (एकता केन्द्र) और संयुक्त जनमोर्चा ने राजनीतिक आन्दोलन के लिए पहल की। ने.क.पा. (मसाल), नेपाल कम्युनिस्ट लीग और ने.क.पा. (मा-ले-मा) के साथ मिलकर एक ‘संयुक्त जनान्दोलन समिति’ गठित की गयी जिसके तत्तवावधन में 6 अप्रैल की प्रसिद्ध आम हड़ताल हुई। पुलिस ने हड़ताल का बर्बर दमन किया। इस घटना ने ने.कां. और विपक्षी ने.क.पा. (एमाले) की संसदीय राजनीति के चरित्र को एकदम नंगा कर दिया। आगे चलकर मनमोहन अधिकारी के नेतृत्व में जब ने.क.पा. (एमाले) सत्तासीन हुई और फिर उसने शेर बहादुर देउबा के साथ अवसरवादी गँठजोड़ किया तो उसका चेहरा और अधिक नंगा हो गया। व्यापक मोहभंग और जनाक्रोश को 1996 तक देशव्यापी जन-उभार में परिणत कर पाने में क्रान्तिकारी वाम की शक्तियाँ विफल रहीं। इसका बुनियादी कारण राजनीतिक मतभेदों के चलते जारी बिखराव की प्रक्रिया थी। पहल ले पाने में सक्षम सर्वाधिक महत्तवपूर्ण पार्टी ने.क.पा. (एकता केन्द्र) थी, लेकिन 1994 में वह फिर फूट का शिकार हुई। कभी अतिवामपन्थी तो कभी दक्षिणपन्थी अवस्थिति अपनाते रहने वाले मोहन बिक्रम सिंह अपनी पुरानी साख-प्रतिष्ठा का काफ़ी हिस्सा खो चुके थे और पहले से ही सिकुड़ती जा रही ने.क.पा. (मसाल) अब अपनी काफ़ी शक्ति और आधार खो चुकी थी। अन्य छोटी-छोटी क्रान्तिकारी वामपार्टियाँ अपनी पहल पर प्रभावी ढंग से कुछ हस्तक्षेप कर पाने में सफल नहीं थीं। इन्हीं परिस्थितियों में ने.क.पा. (माओवादी) ने जनयुद्ध की शुरुआत की। 4 फ़रवरी 1996 को बाबूराम भट्टराई ने प्रधनमन्त्री शेर बहादुर देउबा को एक चालीस-सूत्री माँगपत्रक दिया और उन माँगों को न माने जाने की स्थिति में गृहयुद्ध की चेतावनी दी। सभी असमान सन्धियों को रद्द करना, नेपाली उद्योग, वाणिज्य और वित्तीय भूस्वामियों की ज़मीन जब्त करके उसका भूमिहीनों और ग़रीबों में वितरण करना आदि माँगपत्रक की प्रमुख माँगें थीं। 26 अप्रैल, 2006 को प्रचण्ड ने पर्वतीय क्षेत्रों और पश्चिमी नेपाल में अपना नियन्त्रण क्षेत्र स्थापित करने के उद्देश्य से सामरिक प्रयासों के लिए निर्देश जारी किया। व्यापक नेपाली जनसमुदाय ने जनयुद्ध की घोषणा को कुछ आशंकाओं के बावजूद नयी उम्मीदों के साथ देखा। जनयुद्ध के आगे बढ़ने के साथ ही ये उम्मीदें भी बढ़ती गयीं और जनता में माओवादियों का समर्थन आधार तेज़ी से बढ़ता चला गया।
(अगली पोस्ट में जारी )
अशोक said
इस शानदार जानकारी के लिये आभार
संगीता पुरी said
बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
Rachana Gaur Bharti said
ब्लोगिंग जगत मे स्वागत है
बधाई
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
http://www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लिए देखें
http://www.chitrasansar.blogspot.com
govind goyal said
ok sir, good jankari. narayan narayan
mayur said
होली की मुबारकबाद,पिछले कई दिनों से हम एक श्रंखला चला रहे हैं “रंग बरसे आप झूमे ” आज उसके समापन अवसर पर हम आपको होली मनाने अपने ब्लॉग पर आमंत्रित करते हैं .अपनी अपनी डगर । उम्मीद है आप आकर रंगों का एहसास करेंगे और अपने विचारों से हमें अवगत कराएंगे .sarparast.blogspot.com