नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-9
Posted by FNR on March 24, 2009
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ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र) के बीच मतभेद के मुद्दे, राजनीतिक वाद-विवाद और क़दम-ब-क़दम एकता की ओर अग्रवर्ती विकास
पिछले लगभग दो दशकों के दौरान नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर में बिखराव, एकता और ध्रुवीकरण की जो प्रक्रिया चलती रही है उसमें दो पार्टियाँ प्रमुख शक्तियों के रूप में उभरकर सामने आयीं पहली, ने.क.पा. (माओवादी) और दूसरी ने.क.पा. (एकता केन्द्र)। राजनीतिक विश्लेषक पिछले एक दशक के दौरान नेपाल में माओवादी जनयुद्ध की विकास-प्रक्रिया और उसकी उपलब्धियों-विशिष्टताओं पर काफ़ी कुछ लिखते रहे हैं, लेकिन इस दौरान ने.क.पा. (माओवादी) की अवस्थितियों में आये महत्तवपूर्ण और नाटकीय बदलाव पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। जनयुद्ध की पूरी अवधि के दौरान माओवादियों की नीतियों में आये बहुतेरे बदलावों के पीछे क्रान्तिकारी वाम शिविर की इन दो प्रमुख धाराओं के बीच जारी बहसों का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है। इन बहसों को पश्चदृष्टि से देखने पर हम पाते हैं कि 1994 में ने.क.पा. (एकता केन्द्र) से अलग होने और 1996 में जनयुद्ध शुरू करने के समय से लेकर बाद के लगभग एक दशक के दौरान ने.क.पा. (माओवादी) ने क्रान्तिकारी व्यवहार के दौरान अपनी बहुत सारी पूर्ववर्ती अवस्थितियों को छोड़कर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थितियों को अपना लिया। 2007 तक स्थिति यह हो चुकी थी कि मतभेद के अधिकांश मुद्दे हल हो गये थे। ऊपर हम चर्चा कर आये हैं कि 1994 की फूट के समय ने.क.पा. (एकता केन्द्र) में मतभेद का पहला मुद्दा समाजवादी संक्रमण से जुड़े अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के अनुभवों के आकलन को लेकर था। इस प्रश्न पर आगे चलकर ने.क.पा. (माओवादी) ने मूलत: और मुख्यत: ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थिति को अपना लिया। मतभेद का दूसरा मुद्दा सर्वहारा जनवाद की समझदारी और उससे जुड़ी समस्याओं को लेकर था। इस प्रश्न पर भी आगे चलकर ने.क.पा. (माओवादी) ने.क.पा. (एकता केन्द्र) के निष्कर्षों पर आ गयी और इस मुद्दे पर दस्तावेज़ भी निकाला। लेकिन इस समस्या के उपचार को लेकर माओवादियों की जो सोच है, उसमें ने.क.पा. (एकता केन्द्र) दक्षिणपन्थी भटकाव का एक नया ख़तरा देख रही है। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का मानना है कि बहुदलीय लोकतन्त्र की भूमिका को ने.क.पा. (माओवादी) बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखती है और उसकी सीमाओं की अनदेखी कर रही है। बहुदलीय प्रतिस्पध्र्दा की बात तो मार्क्स और एंगेल्स ने भी की थी, लेकिन समाजवाद की रक्षा और निर्माण बहुदलीय जनवाद से नहीं बल्कि सोवियत जनवाद से ही हो सकता है। बहुदलीय संसदीय मंच उसका सहायक अंग ही हो सकता है। एकता केन्द्र को माओवादियों की सोच में मदन भण्डारी द्वारा प्रस्तुत बहुदलीय लोकतन्त्र की अवधरणा की ओर झुकाव का ख़तरा दिखायी देता है। उसका मानना है कि सर्वहारा जनवाद या नवजनवाद को स्वीकार करने वाली पार्टियों के बीच प्रतिस्पध्र्दा हो सकती है, लेकिन समाजवादी संक्रमण के दौरान आने वाली जनवाद की समस्या का समाधन उससे नहीं हो सकता। समाधन केवल सोवियत मॉडल में है कठपुतली सोवियतें नहीं बल्कि प्रभावी सोवियतों में है। उल्लेखनीय है कि इस प्रश्न पर ने.क.पा. (माओवादी) पहले जड़सूत्रवादी अवस्थिति पर खड़ी थी जबकि अब उसकी अवस्थिति में दक्षिणपन्थी भटकाव का ख़तरा दिख रहा है।
मतभेद के तीसरे मुद्दे, यानी क्रान्ति के रास्ते के प्रश्न पर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने जब लोकयुद्ध के साथ आम बग़ावत के कुछ घटकों के भी संश्लेषण की बात कही थी तो ने.क.पा. (माओवादी) ने सारसंग्रहवादी कहकर उनकी आलोचना की थी लेकिन बाद में उन्होंने इसी धरणा को अपना लिया और इसे ‘प्रचण्ड पथ‘ का एक घटक बना लिया।
लेकिन ‘प्रचण्ड पथ‘ के प्रश्न पर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का दृष्टिकोण अभी भी तीव्र आलोचनात्मक है। फ़र्क़ यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) अब कम से कम उसकी आलोचना पर विचार करने के लिए तैयार है। सन 2000 में मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के साथ ‘प्रचण्ड पथ‘ को भी नेपाली क्रान्ति का मार्गदर्शक सिद्धान्त घोषित करते हुए ने.क.पा. (माओवादी) ने एक बार फिर अपनी ही उस अवस्थिति को पलट दिया था, जिस पर खड़े होकर उसने कभी पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा ‘गोंज़ालो विचारधारा‘ को विचारधारात्मक मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाने का विरोध किया था। ‘प्रचण्ड पथ‘ के सार्वभौमिक महत्तव की व्याख्या पार्टी के तीन नेता तीन अलग-अलग तरीक़ों से करते हैं। बाबूराम भट्टराई कहते हैं कि मुख्यत: नेपाली विशिष्टता के बावजूद इसका एक सार्वभौमिक चरित्र भी है। प्रचण्ड का कहना है कि विश्व क्रान्ति को दिशा देने के लिए ‘प्रचण्ड पथ‘ को अभी लम्बा रास्ता तय करना होगा। इस प्रकार सार्वभौमिकता पर उनका ज़ोर भट्टराई से कुछ अधिक है। लेकिन सबसे आगे बढ़कर, केन्द्रीय कमेटी के तीसरे प्रमुख सदस्य किरण इसे ‘इक्कीसवीं सदी की विश्व क्रान्ति की आधारशिला‘ ही घोषित कर देते हैं। इससे अधिक हास्यास्पद बड़बोलापन कुछ और नहीं हो सकता। नेपाल में जारी राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति वस्तुत: इतिहास का एक छूटा हुआ कार्यभार है जो अब पूरा हो रहा है। यह बीसवीं सदी की क्रान्ति है जो इक्कीसवीं सदी में हो रही है। पिछड़ी उत्पादक शक्तियों वाले नेपाल में क्रान्ति के मार्ग का सामान्य अनुभव किसी भी रूप में पूँजीवादी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुके भारत, चीन, द. अफ्रीका, नाइजीरिया, मिस्र, इण्डोनेशिया, मलेशिया, ब्राज़ील, चीले, अर्जेण्टीना, मेक्सिकोआदि तीसरी दुनिया के उन अधिकांश देशों की क्रान्तियों का मार्गदर्शक नहीं हो सकता जहाँ आधारभूत-अवरचनागत उद्योगों और वित्तीय पूँजी की शक्ति का काफ़ी विकास हो चुका है, भूमि-सम्बन्धों में पूँजीवादी बदलाव के बाद वर्ग-संश्रय बदल चुका है और जहाँ सर्वहारा-अर्ध्दसर्वहारा आबादी की जनसंख्या आज आबादी के अन्य वर्गों की अपेक्षा सबसे अधिक हो चुकी है। स्पष्ट है कि बदली विश्व-परिस्थितियों के बारे में ने.क.पा. (माओवादी) की सोच निहायत सतही, यान्त्रिक और बचकानी रही है। ‘प्रचण्ड पथ‘ की अवधरणा के बड़बोलेपन को समझने के लिए संक्षेप में यह भी जान लेना ज़रूरी है कि इसके कौन से संघटक अवयव गिनाये जाते हैं!
‘प्रचण्ड पथ‘ का एक संघटक अवयव यह बताया गया कि इसने दक्षिणपन्थी संशोधनवाद और कठमुल्लावादी संशोधनवाद ऌन दोनों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए क्रान्तिकारी मार्क्सवाद को आभ्यन्तरीकृत किया। लेकिन यह ‘प्रचण्ड पथ‘ की नयी विशिष्टता नहीं, मार्क्सवाद की पुरानी विशिष्टता है। मार्क्सवाद अपने जन्मकाल से ही इन दोनों प्रकार के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्र्ष करते हुए विकसित हुआ है।
‘प्रचण्ड पथ‘ का दूसरा संघटक अवयव यह बताया गया कि इसने स्तालिन द्वारा प्रस्तुत एकाश्मी पार्टी की धरणा को ख़ारिज करके दो लाइनों के संघर्ष और आन्तरिक संघर्ष की सजीव प्रक्रिया से लैस पार्टी की धरणा को स्थापित किया। यह भी एक निहायत हास्यास्पद बात है। दो लाइनों के संघर्ष की सजीव आवयविक व्यवस्था से लैस पार्टी की सोच पार्टी की लेनिनवादी अवधरणा का बुनियादी सूत्र है, जिससे स्तालिन काल में कुछ विचलन पैदा हुआ। पुन: माओ त्से-तुङ ने इस अवधरणा को न केवल स्थापित किया बल्कि सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर तक आते-आते नयी ऊँचाइयों तक विकसित किया। प्रचण्ड का इसमें कोई भी मौलिक अवदान नहीं माना जा सकता। पार्टी गठन के सन्दर्भ में ने.क.पा. (माओवादी) का यह दावा है कि नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास के वस्तुपरक विश्लेषण के द्वारा उसने पार्टी एकता को नयी ऊँचाइयों तक विकसित किया और यह भी ‘प्रचण्ड पथ‘ की एक विशिष्टता है। इस दावे की सच्चाई क्या है? मोहन बिक्रम सिंह द्वारा पुष्पलाल को ‘ग़द्दार‘ घोषित करने से अलग हटकर ने.क.पा. (माओवादी) ने उनकी सकारात्मक भूमिका का सही मूल्याँकन रखा, लेकिन साथ ही उसने पुष्पलाल के दक्षिणपन्थी भटकावों की पूरी तरह से अनदेखी की। इस मायने में भी ने.क.पा. (एकता केन्द्र) द्वारा प्रस्तुत मूल्यांकन अधिक सन्तुलित है। जहाँ तक पार्टी एकता का प्रश्न है, ‘प्रचण्ड पथ‘ के सूत्रीकरण ने उसके रास्ते में कुछ नयी बाधएँ ही पैदा कीं।
ने.क.पा. (माओवादी) दक्षिण एशिया सोवियत संघ के अपने प्रस्ताव को भी एक सकारात्मक अवदान मानते हुए इसे ‘प्रचण्ड पथ‘ का एक घटक तत्व बताया। इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह है कि आज इस प्रस्ताव की कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है और यह केवल एक मंसूबावादी विचार ही हो सकता है। ऐसा कोई संघ दक्षिण एशिया के देशों में सर्वहारा क्रान्ति के बाद ही बन सकता है और वह भी तब, जबकि उन सभी देशों की सर्वहारा सत्ताएँ उसे स्वीकार करें। दूसरी बात यह कि ऐसे किसी क्षेत्रीय संघ का गठन विश्व सर्वहारा क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास की अपरिहार्य शर्त या एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता। ऐसी सम्भावना हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। तीसरी बात यह कि क्रान्ति के पहले और क्रान्ति के बाद दुनियाभर की कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी भावना से एक दूसरे की मदद करना और किसी प्रकार के अन्तरराष्ट्रीय मंच का गठन करना एक बात है और दक्षिण एशिया सोवियत संघ जैसी किसी चीज़ का निर्माण सर्वथा अलग बात है। चौथी बात यह कि दक्षिण एशिया के बड़े, विकसित देशों में क्रान्तिकारी वाम की शक्तियाँ अभी क्रान्ति को नेतृत्व दे पाने की स्थिति से काफ़ी दूर हैं और आज ऐसे किसी संघ की बात सोचना ख्याली पुलाव से अधिक कुछ भी नहीं है। पाँचवी बात यह कि आज इस प्रकार की बातें करना बड़े देशों की पार्टियों के ‘बड़े भाइयों जैसे रवैये‘ को और क्रान्ति के आयात-निर्यात की धरणा को बढ़ावा देने का काम कर सकता है।
‘प्रचण्ड पथ‘ की एक मुख्य विशेषता यह बतायी गयी कि इसने सशस्त्र विद्रोह की कतिपय रणनीतियों को दीर्घकालिक लोकयुद्ध के क्रान्ति-मार्ग के फ़्रेमवर्क में समाहित कर लिया। सच्चाई यह है कि ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने जब इस प्रकार के संश्लेषण की बात की थी तो माओवादी नेतृत्व ने सारसंग्रहवादी कहते हुए उनकी आलोचना की थी। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने 1996 के अपने पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में ही यह बात कही थी। साथ ही, ‘प्रचण्ड पथ‘ इस प्रकार के संश्लेषण को इक्कीसवीं सदी की सर्वहारा क्रान्तियों की एक सार्वभौमिक विशिष्टता बताता है जबकि ऐसा मानने का कोई भी तर्कसंगत आधार नहीं है।
रणनीतिक दृढ़ता और रणकौशलात्मक लचीलेपन को ने.क.पा. (माओवादी) ‘प्रचण्ड पथ‘ की एक और विशिष्टता बताती है। यह विशिष्टता लेनिन के ज़माने से ही सर्वहारा पार्टियों की परिपक्वता की निशानी मानी जाती रही है। यह कोई मौलिक खोज नहीं है। सच्चाई यह है कि ‘रणकौशलात्मक लचीलेपन‘ के नाम पर ने.क.पा. (माओवादी) अपनी नीतियों में अक्सर बेहद अस्थिरता का संकेत देती रही है और उसका नेतृत्व अक्सर निहायत ग़ैरज़िम्मेदाराना ढंग से विचारधारात्मक-रणनीतिक उसूली मसलों को भी रणकौशल और कूटनीति का मसला बना देता रहा है। यह प्रवृत्ति यदि बनी रही तो ख़तरनाक ढंग से दक्षिणपन्थी विपथगमन का सबब बन सकती है। 1999 में ने.क.पा. (माओवादी) ने वामपन्थियों, देशभक्तों और जनवादी ताक़तों की संयुक्त क्रान्तिकारी सरकार का रणकौशलात्मक नारा दिया। बाद में तत्कालीन संविधान को रद्द करने, संसद भंग करने, अन्तरिम सरकार के गठन और संविधान सभा का रणकौशलात्मक नारा आया। उसके बाद उन्होंने सर्व-पार्टी सम्मेलन, अन्तरिम सरकार और एक ‘लोक संविधान की गारण्टी‘ का नारा दिया। इसके बाद एक केन्द्रीय लोक सरकार का रणकौशलत्मक नारा दिया गया, जिसे ढाई वर्ष बाद पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन ने मुख्य रणनीतिक नारा बना दिया।
ने.क.पा. (माओवादी) रणकौशल ही नहीं, बल्कि विचारधारा और राजनीति के बुनियादी उसूली प्रश्नों पर भी गैरउसूली लचीला रुख़ अपनाती रही है। 2003 तक उनका आकलन था कि जनयुद्ध अब जल्दी ही रणनीतिक आक्रमण के दौर में प्रविष्ट हो जायेगा, फिर इस आकलन से पीछे हटते हुए उन्हें संविधान सभा के चुनाव और संघात्मक गणराज्य की स्थापना के रणकौशलात्मक नारे तक आना पड़ा। लेकिन फिर इस रणकौशलात्मक अवस्थिति से आगे बढ़कर उनका नेतृत्व सर्वहारा जनवाद की ही नयी अवधरणा प्रस्तुत करने लगा और बहुदलीय संसदीय जनवादी प्रणाली और बहुदलीय प्रतिस्पध्र्दा को उसका प्रमुख आधार बताते हुए प्रकारान्तर से सोवियत और कम्यून व्यवस्था की ग्रासरूट से लेकर शीर्ष तक की सर्वहारा जनवादी प्रणाली की अपरिहार्यता को ख़ारिज करने की दक्षिणपन्थी अवस्थिति के निकट जा पहुँचा। ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व की एक विशिष्टता यह रही है कि आलोचना होने पर वह अपनी अवस्थितियों को बार-बार बदलने वाले बयान भी देता रहा है। एक दूसरी विशिष्टता यह रही है कि विगत दस वर्षों के दौरान उन्होंने अपनी कई पुरानी अवस्थितियों को बिना खुली आत्मालोचना या आत्मविश्लेषण के बदल लिया है और ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थितियों को चुपचाप अपना लिया है। अपनी ”वामपन्थी” ग़लतियों को कोई भी पार्टी जब इस प्रकार की पैबन्दसाज़ी से या इंच-इंच पीछे खिसककर ठीक करने की कोशिश करती है तो क़तारों की राजनीतिक शिक्षा नहीं हो पाती है और पेण्डुलम के दूसरे छोर तक जा पहुँचने और पार्टी के दक्षिणपन्थी ‘प्रैगमेटिज्म‘ के पंककुण्ड में जा गिरने का ख़तरा पैदा हो जाता है।
ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने.क.पा. (माओवादी) की कमोबेश इसी आशय की आलोचना लगातार रखती रही है। अधिकांश मामलों में ने.क.पा. (माओवादी) ने धीरे-धीरे ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की ही अवस्थितियों को अपना लिया है। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि रणकौशलात्मक नारे के रूप में संविधान सभा और गणतन्त्र के नारे को सबसे पहले ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने ही आगे बढ़ाया (रणनीतिक नारे के रूप में तो यह बात 1950 से ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी)। माओवादियों ने गणतन्त्र के संस्थागत विकास का नारा दिया। एकता केन्द्र ने अन्तरिम सरकार, संविधान सभा और गणतन्त्र का नारा इस तर्क के साथ दिया कि इससे राजनीतिक प्रणाली का फैसला स्वयं जनता करेगी तथा इस नारे का साम्राज्यवादी और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी विरोध नहीं कर सकेंगी। माओवादियों के विपरीत एकता केन्द्र निर्णायक युद्ध द्वारा केन्द्रीय सत्ता पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं मानती थी। बाद में माओवादी भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और क्रान्ति की दीर्घकालिकता की नयी समझ के साथ संविधान सभा, गणतन्त्र और अन्तरिम सरकार की माँग को स्वीकार कर वे सात पार्टियों के गठबन्धन के साथ समझौते की मेज़ पर आये।
चुनाव प्रणाली को लेकर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का शुरू से ही स्टैण्ड था कि पूर्ण समानुपातिक प्रणाली से चुनाव होना चाहिए। एक महीने तक ने.क.पा. (माओवादी) इस माँग से सहमत थी, लेकिन नवम्बर में चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद उन्होंने अन्तरिम संसद से गणतन्त्र की घोषणा और पूर्ण समानुपातिक प्रणाली की माँग छोड़ दी और गठबन्धन के अन्य दलों के साथ हो लिये। लेकिन कुछ समय बाद फिर ने.क.पा. (माओवादी) के प्लेनम ने यह प्रस्ताव पारित किया कि अगर गणतन्त्र की घोषणा नहीं हुई और पूर्ण समानुपातिक प्रणाली के आधार पर चुनाव नहीं कराया गया तो उसमें वे भागीदारी नहीं करेंगे। फिर कुछ समय बाद वे कहने लगे कि जून 2007 के बाद संविधान सभा के चुनाव के लिए परिस्थिति अनुकूल नहीं रह गयी है। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का तब मानना था कि क्रान्तिकारी वाम के समक्ष तीन विकल्प हैं : पहला, संविधान सभा के चुनाव में भागीदारी, दूसरा, जनउभार के द्वारा क्रान्तिकारी वाम नेतृत्व में गणतन्त्र की स्थापना और तीसरा, राजनीतिक तबाही। अप्रैल 2006 का जनादेश पहले विकल्प के लिए है और परिस्थितियाँ भी इसी के लिए अनुकूल हैं। यदि साम्राज्यवादियों-प्रतिक्रियावादियों की साज़िशों से पहला विकल्प सफल नहीं हो सकेगा तो जनता इसे स्वयं समझकर दूसरे विकल्प का रास्ता पकड़ेगी। ने.क.पा. (माओवादी) भी आख़िरकार इसी निष्कर्ष पर पहुँची।
(अगली पोस्ट में जारी)