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नेपाली क्रान्ति किस ओर? नयी परिस्थितियाँ और पुराने सवाल

Posted by FNR on June 19, 2009

पिछली पोस्‍टों में हम नेपाल की क्रांति और नेपाल के माओवादी आन्‍दोलन का इतिहास और विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करते रहे हैं, जो आगे भी जारी रहेगा। इस बार हम नेपाल के ताजा घटनाक्रम और माओवादी पार्टी अंतरविरोधों पर प्रकाश डालता आलोक रंजन का लेख प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

………………………………………………

नेपाल विगत एक माह से भी अधिक समय से अनिश्चय और उथल-पुथल के भँवर से गुज़र रहा है। प्रधानमन्त्री पद से एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के अधयक्ष पुष्प कमल दहाल ‘प्रचण्ड’ के इस्तीफे (4 मई ‘09) के बाद से ही देशव्यापी बन्द, हड़तालों और प्रदर्शनों के चलते शासन और प्रशासन की मशीनरी लगभग ठप्प है।

संकट की शुरुआत तब हुई जब जनता द्वारा चुनी गयी नागरिक सरकार की निरन्तर और जानबूझकर अवमानना के आरोप में प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने सेनाधयक्ष कटवाल को बर्खास्त कर दिया। कटवाल ने प्रधानमन्त्री के इस निर्देश को मानने से इनकार कर दिया। राष्ट्रपति रामबरन यादव ने भी प्रचण्ड के निर्देश को ठुकराते हुए और अन्तरिम संविधान की अवहेलना करते हुए कटवाल से पद पर बने रहने को कहा। फिर इस प्रश्न पर सरकार के दो सहयोगी दलों ने.क.पा. (ए.मा.ले.) मधोसी जनाधिकार मंच ने भी माओवादियों का साथ छोड़ दिया। नतीजतन सरकार अल्पमत में आ गयी और प्रचण्ड को इस्तीफा देना पड़ा। गत 23 मई को 24 में से 21 पार्टियों के समर्थन से माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में नयी सरकार सत्तारूढ़ हुई जिसमें ने.क.पा (ए.मा.ले.) और नेपाली कांग्रेस मुख्य भागीदार हैं। नयी सरकार को समर्थन के मसले पर मधोसी जनाधिकार मंच दोफाड़ हो चुका है। विजय कुमार गच्छेदार गुट सरकार में शामिल है और गच्छेदार एक उपप्रधानमन्त्री हैं जबकि उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाला गुट विपक्ष में है।

एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) का कहना है कि सेना पर नागरिक सरकार का नियन्त्रण हर हाल में निर्णायक तौर पर क्फ़ायम होना चाहिए और राष्ट्रपति को सेनाधयक्ष कटवाल की बहाली सम्बन्‍धी अपना असंवैधानिक निर्देश वापस लेना चाहिए। उसका यह भी स्पष्ट आरोप है कि एक बड़ा पड़ोसी देश (स्पष्ट इशारा भारत की ओर है) अपने निहित स्वार्थों और विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं के चलते नेपाल के अन्दरूनी मामलों में दख़लन्दाज़ी कर रहा है और कटवाल-प्रकरण के पीछे भी उसकी अहम भूमिका है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रचण्ड के नेतृत्व वाली सरकार भारत के साथ तमाम असमानतापूर्ण सन्धियों की समीक्षा और समानता के आधार पर नये सम्बन्‍ध की माँग करती रही है और भारत पर पारम्परिक निर्भरता को छोड़कर चीन के साथ भी सहकार-सम्बन्‍ध की इच्छा ज़ाहिर करती रही है। साथ ही, भारत सरकार को यह भय भी सताता रहा है कि नेपाल में माओवादियों की सरकार रहते भारत में भी माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष को विशेष बढ़ावा मिलेगा।

लेकिन मुख्य बात यह है कि नेपाल के साथ विगत आधी सदी से भी अधिक समय से जारी असमानतापूर्ण सम्बन्‍धों को भारतीय शासक वर्ग हर कीमत पर बनाये रखना चाहता है। सभी छोटे पड़ोसी देशों के प्रति भारतीय शासक वर्ग का विस्तारवादी और ”बड़े भाई” जैसा व्यवहार हमेशा से जगज़ाहिर रहा है और चीन के साथ उसकी प्रतिस्पर्द्धा भी कोई छुपी बात नहीं है। ऐसी स्थिति में नेपाल की नयी सरकार द्वारा समानतापूर्ण सम्बन्‍धों और सभी पड़ोसियों से (यानी चीन से भी) समान रूप से बेहतर सम्बन्‍धों की बात करना भारतीय शासक वर्ग भला कैसे पसन्द कर सकता था? काठमाण्डू स्थित भारतीय दूतावास लगातार वहाँ के अन्दरूनी मामलों में दख़ल देता रहा है। अपनी इसी स्थिति को बनाये रखने के लिए भारत सरकार ने लोकयु) और जनान्दोलन के दौरान लगातार राजशाही की भरपूर मदद की। नेपाल के क्रान्तिकारी संघर्ष को कुचलने में उसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के विश्वस्त सहयोगी की भूमिका निभायी। लेकिन राजशाही का पतन सुनिश्चित होने और संविधान सभा के चुनाव में ने.क.पा. (माओवादी) के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद भारतीय शासक वर्ग ने नेपाली कांग्रेस और ने.क.पा. (ए.मा.ले.) पर दाँव लगाया और हरचन्द कोशिशें की कि ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में सरकार का गठन न हो सके। उसकी इस भूमिका के चलते नेपाली जनता के भीतर यह धारणा और अधिक मज़बूत हुई है कि भारत एक विस्तारवादी देश है जो हर हाल में सम्प्रभु, स्वतन्त्र, जनवादी नेपाली गणराज्य का विरोध करता रहेगा।

जहाँ तक नेपाल के भीतर वर्ग-शक्ति- सन्तुलन का सवाल है, तमाम आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, वहाँ की क्रान्ति-विरोधी बुर्जुआ और सामन्ती ताक्फ़तें निर्णायक मसलों पर माओवादियों के ख़िलाफ एकजुट हैं। सत्तालोलुपता के चलते बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियों के बीच जो अन्तरविरोध उठते रहे हैं, उनका लाभ एक हद तक ने.क.पा. (माओवादी) को भी मिलता रहा है। लेकिन जब भी कोई बुनियादी नीतिगत मामला सामने आता है तो माओवादी अपने को एकदम अलग-थलग पाते हैं।

संविधान सभा के चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद ने.क.पा. (माओवादी) को सत्ता सँभालने की वैध हक्फ़दार ताक्फ़त के रूप में नेपाल के भीतर और बाहर की प्रतिक्रियावादी ताक्फ़तों ने कभी भी स्वीकार नहीं किया। सरकार में शामिल होने के बाद भी ने.क.पा. (ए.मा.ले.) और मधोसी पार्टियों ने आंशिक बुनियादी बदलाव के हर सवाल पर ने.क.पा. (माओवादी) का विरोध किया। शान्ति समझौते और अन्तरिम संविधान की तमाम शर्तों को ताक्फ़ पर रख दिया गया। सेना के एकीकरण की तय शर्तों को ठुकराकर नयी-नयी शतर्ें लगायी जाती रहीं। तनाव बढ़ता रहा और फिर इसी की तार्किक परिणति प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के रूप में सामने आयी।

नेपाल के घटनाओं ने एक बार फिर इस इतिहाससि) धारणा को ही पुख्ता किया है कि संसदीय चुनावों में बहुमत पाने के बावजूद मेहनतकश जनसमुदाय राज्य मशीनरी का अपने हितों के अनुरूप पुनर्गठन नहीं कर सकता। वह शासक वर्ग की राज्य मशीनरी का धवंस करके ही नयी राज्य मशीनरी की स्थापना कर सकता है। बेशक बुर्जुआ संसदीय चुनावों और संसद का (और यहाँ तक कि अन्तरिम या आरज़ी सरकारों का भी) रणकौशलगत (टैक्टिकल) इस्तेमाल किया जा सकता है, पर इनके द्वारा व्यवस्था परिवर्तन, या एक वर्ग से दूसरे वर्ग के हाथों सत्ता-हस्तान्तरण, नामुमकिन है। बुर्जुआ सत्ता का धवंस ही एकमात्र ऐतिहासिक विकल्प है।

ने.क.पा. (माओवादी) की समस्या यह रही है कि वह अपनी तमाम ”नयी स्थापनाओं” और गोलमोल, अस्पष्ट, द्विअर्थी वक्तव्यों से राज्य और क्रान्ति के प्रश्न पर स्वयं ही विभ्रम पैदा करती रही है और ढुलमुलपन का परिचय देती रही है। रणनीति (स्ट्रैटेजी) और बुनियादी विचारधारात्मक प्रश्नों को भी प्राय: वह रणकौशल के रूप में या कूटनीति के रूप में प्रस्तुत करती रही है। सर्वहारा अधिनायकत्व के अन्तर्गत पेरिस कम्यून और सोवियतों जैसी किसी ग्रासरूट स्तर की सर्वहारा जनवादी प्रणाली के बजाय वह बहुदलीय संसदीय प्रणाली की बात करती रही है और जनता में इस विभ्रममूलक धारणा को पुख्ता बनाती रही है कि मौजूदा संविधान सभा के ज़रिये और इसके द्वारा निर्मित संविधान के अन्तर्गत होने वाले चुनाव में जीतकर वह नेपाल में लोक जनवादी गणराज्य और फिर समाजवादी गणराज्य की स्थापना कर सकती है। ने.क.पा. (माओवादी) हालाँकि बीच-बीच में ‘नरो वा कुंजरो’ की भाषा में जनसंघर्ष की बात भी करती रहती है, पर उसकी कुल बातों का मुख्य ज़ोर संसदीय रास्ते पर ही पड़ता है। चुनाव जीतकर सत्तासीन होने और क्रान्तिकारी अर्थों में सत्ता कब्ज़ा करने के बीच के फक्र्फ़ को ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व ने स्वयं ही अपनी कथनी और करनी से जनता की नज़रों में काफी धूमिल कर दिया है। इस तरह उसने जनता और पार्टी कतारों की वर्ग संघर्ष की तैयारी की प्रक्रिया को स्वयं ही कमज़ोर कर दिया है।

प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के बाद नेपाली क्रान्ति के नेतृत्व के सामने एक कठिन चुनौतीपूर्ण लेकिन साथ ही सुनहरा अवसर आया था कि वह बुर्जुआ संसदीय विभ्रमों को तार-तार करते हुए जनता के बीच यह सन्देश लेकर जाये कि केवल जनसंघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। एक बार फिर सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों में आधार इलाकों को मजबूत बनाने और शहरी क्षेत्रों में हड़तालों- प्रदर्शनों-जनान्दोलनों के सिलसिले को मजबूत बनाने का अवसर था। शान्ति समझौते और अन्तरिम संविधान के विपक्षी दलों द्वारा कई मामलों में उल्लंघन के बाद संघर्ष के रास्ते को न्यायोचित ठहराने का तर्क भी था। होना यह चाहिए था कि प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के बाद सभी माओवादी सांसदों को भी इस्तीफा देकर सड़क के संघर्ष में उतर पड़ना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ। इसका मूल कारण यह है कि पार्टी भी अब शायद इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं है और जनता को भी उसने इसके लिए तैयार नहीं किया है। सेना एकीकरण की शर्त को मानने के बाद (इस पर ‘बिगुल’ में हम अपनी शंका रख चुके हैं) जन सेना का बड़ा हिस्सा कैण्टोनमेण्ट में निश्शस्त्र बैठा है। बाहर युवा कम्युनिस्ट लीग और स्वयंसेवक दस्तों की ताक्फ़त है, पर वह सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं है। पुराने आधार इलाकों की समानान्तर लोकसत्ता मज़बूत होने के बजाय विगत दो वर्षों के दौरान कमज़ोर हुई है। पार्टी नेतृत्व अपना धयान समानान्तर लोकसत्ता को मज़बूत बनाने और बुर्जुआ संसदीय प्रणाली के ‘एक्सपोज़र’ के बजाय, सरकार चलाने पर और विभिन्न ”लोक कल्याणकारी” कार्यों पर केन्द्रित किये रहा है। पार्टी नेतृत्व का एक हिस्सा यह कहता रहा है कि मौजूदा संविधान सभा एक लोक जनवादी संविधान का निर्माण नहीं कर सकती, इसलिए हमारी कोशिश एक ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुख संविधान बनाने की ही हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि जब अधिकांश बुनियादी मसलों पर सभी बुर्जुआ और संशोधनवादी एकजुट हो जाते हैं, तो सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद ने.क.पा. (माओवादी) भला अंशत: जनोन्मुख संविधान स्वीकृत करवा पाने में भी सफल कैसे हो सकती है! यह तर्क दिया जा सकता है कि संविधान में बुर्जुआ जनवादी प्रावधानों का दायरा विस्तारित होने की स्थिति जनसंघर्ष के लिए अनुकूल होगी। लेकिन यह तर्क एक वैधिक विभ्रम है। नेपाल का शासक वर्ग आज जिस संकट से गुज़र रहा है, उसमें वह बुर्जुआ जनवाद के दायरे को वास्तव में विस्तारित नहीं होने देगा और यदि संविधान में ऐसे प्रावधान हों भी तो व्यवहार में इनका कोई मतलब नहीं रह जायेगा। दूसरी बात यह कि नेपाल में वर्ग संघर्ष जिस मंज़िल पर पहुँच चुका है, उस मुक्फ़ाम पर यह प्रश्न काफी हद तक अप्रासंगिक है कि वहाँ बुर्जुआ जनवाद का दायरा कितना विस्तारित या संकुचित होगा। आज यदि नेपाल में बुर्जुआ जनवाद के दायरे को फैलाने के संघर्ष पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता है तो यह भी एक सामाजिक जनवादी भटकाव होगा।

ताज़ा समाचारों के अनुसार, ने.क.पा. (माओवादी) और संशोधनवादी ने.क.पा. (ए.मा.ले.) के बीच समझौता वार्ता सफल होने के क्फ़रीब है। माओवादियों ने आश्वासन दिया है कि सेना पर नागरिक सरकार के नियन्त्रण की गारण्टी और कटवाल प्रकरण में राष्ट्रपति के असंवैधानिक निर्देश के निरस्त होने की स्थिति में वे जनान्दोलन स्थगित करने और संसद में विपक्ष के रूप में बैठकर माधव कुमार नेपाल की सरकार के साथ सहयोग करने तथा संविधान-निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। ज्यादा उम्मीद यही है कि जल्दी ही कोई समझौता- फार्मूला निकल आयेगा। यानी ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में चलने वाले जनान्दोलन का लक्ष्य क्रान्तिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि सापेक्षत: अधिक अनुकूल समझौते के लिए दबाव बनाना मात्र था! ऐसे में यह आशंका उठनी स्वाभाविक है कि क्या ने.क.पा. (माओवादी) विचारधारात्मक विभ्रमों, ढुलमुलपन और संसदीय भटकाव के भँवर में उलझकर वर्ग संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ने की उर्जस्विता और शक्ति खो चुकी है? क्या वह निर्णायक तौर पर संसदीय पक्ष-विपक्ष के खेल में शामिल हो चुकी है? इन प्रश्नों के उत्तार अभी भविष्य के गर्भ में हैं।

लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में फिलहाल दक्षिणपन्थी अवसरवाद का पर्याप्त प्रभाव है, जो पार्टी को लगातार विपथगमन की दिशा में धकेल रहा है। इसका विरोध करने वाली जो धारा है, उसमें भी विचारधारात्मक सुस्पष्टता और सुसंगति की कमी है, जिसके चलते इस धारा से जुड़े लोग भी निर्णायक स्टैण्ड लेने और प्रतिकूल लहर के विरुद्ध डटकर खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। नेपाल की मेहनतकश जनता आज भी एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) को ही अपना नेता और हरावल मानती है। तमाम दक्षिणपन्थी भटकावों की निरन्तरता के बावजूद, इस पार्टी को अभी संशोधनवादी कतई नहीं कहा जा सकता। बुनियादी मुद्दों पर स्पष्टता की कमी के बावजूद पार्टी में दो लाइनों का संघर्ष अभी भी कई स्तरों पर जारी है और क्फ़तारों का क्रान्तिकारी जुझारूपन अभी भी क्फ़ायम है।

इस स्थिति में विश्व सर्वहारा क्रान्ति और नेपाली क्रान्ति के हर समर्थक- शुभचिन्तक की, स्वाभाविक तौर पर यही कामना है कि एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) तमाम संसदीय विभ्रमों और दक्षिणपन्थी विचलनों से मुक्त होकर नेपाल की मेहनतकश जनता के सच्चे क्रान्तिकारी नेता और हरावल दस्ते की भूमिका निभाये। हम नेपाल की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी क्फ़तारों का आह्नवान करते हैं कि वे संशोधनवादी भटकाव की हर किस्म को जड़मूल से नष्ट कर दें क्योंकि यही सर्वहारा क्रान्ति की प्रथम और सर्वोपरि गारण्टी है।

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