नेपाली क्रान्ति : नये दौर की समस्याएँ और चुनौतियाँ, सम्भावनाएँ और दिशाएँ-3
Posted by FNR on August 10, 2009
(पिछली पोस्ट से आगे)
नेपाली क्रान्ति की विजय की मंज़िल अभी दूर है और वहाँ पहुँचने की बुनियादी गारण्टी है विचारधारात्मक भटकावों से मुक्त पार्टी
नेपाली क्रान्ति का रास्ता अत्यन्त लम्बा है और यह बेहद प्रतिकूल विश्व ऐतिहासिक परिस्थितियों में आगे क़दम बढ़ा रही है। नेपाल मात्र 2 करोड़ 90 लाख आबादी का भूआवेष्ठित (चारों ओर ज़मीन से घिरा) देश है, जहाँ बुनियादी एवं अवरचनागत उद्योगों का विकास अत्यन्त कम हुआ है तथा अर्थव्यवस्था बहुत कम विविधीकृत (डायवर्सिफ़ाइड) है। देश की 85 फ़ीसदी आबादी गाँवों में बेहद विपन्न जीवन बिताती है। साक्षरता 50 प्रतिशत से भी कम है। कुपोषण आम बात है और बाल मृत्यु की दर 1000 में 62 है। एक तिहाई आबादी सरकारी ग़रीबी रेखा के नीचे जीती है और लगभग आध देश बेरोज़गार है। दसियों लाख ग़रीब नेपाली भारत में, खाड़ी के देशों में और दूसरे देशों में मज़दूरी करते हैं तथा भारत और ब्रिटेन की सेनाओं में भाड़े के सिपाही के तौर पर काम करते हैं। इनकी कमाई और पर्यटन उद्योग नेपाल के विदेशी मुद्रा भण्डार का मुख्य ड्डोत है।
आम जनता की इन भीषण जीवन-स्थितियों ने नेपाल में सशस्त्र जनक्रान्ति का अनुकूल वस्तुगत आधार तैयार किया। राजशाही के निरंकुश दमन तन्त्र और राजनीतिक जीवन में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार ने आग में घी का काम किया। लेकिन आज की चुनौती यह है कि विरोधी ताक़तों से घिरे, एक भूआवेष्ठित, बेहद पिछड़े देश में, एक ऐसे समय में जब दुनिया में मदद के लिए एक भी समाजवादी देश मौजूद नहीं है, सर्वहारा क्रान्ति किस प्रकार जीवित रहेगी और आगे बढ़ती रहेगी। हमारी यह स्पष्ट और दृढ़ धरणा है कि प्रतिकूलतम परिस्थितियाँ भी क्रान्ति की राह को दुर्गम, लम्बा और जटिल भले बना दें, पर उसका गला नहीं घोंट सकतीं। इतिहास गवाह है कि सर्वहारा क्रान्तियाँ तभी पराजित हुई हैं या उन्हें कुचल पाना भी दुश्मनों के लिए तभी सम्भव हो पाया है, जब उनकी नेतृत्वकारी शक्ति विचारधारात्मक कमज़ोरी या भटकाव या किसी गम्भीर ग़लती के कारण भीतर से कमज़ोर हो गयी। इतिहास गवाह है कि बाहर के शत्रु कई बार सर्वहारा क्रान्तियों को नहीं कुचल सके, लेकिन भीतर से पैदा हुए भटकाव ने पूँजीवादी पथगामियों के लिए फलने-फूलने का आधार तैयार कर दिया और फिर इन भितरघातियों के हाथों क्रान्तियाँ पराजित हो गयीं। तात्पर्य यह कि विपरीततम वस्तुगत परिस्थितियों में भी, एक विचारधारात्मक रूप से सुदृढ़ पार्टी क्रान्ति को मृत्यु या विपथगमन से बचा सकती है, भले ही उसका रास्ता कुछ और लम्बा हो जाये। नेपाली क्रान्ति के सामने भी आज यही प्रश्न केन्द्रीय है। नेपाली क्रान्ति लोक जनवादी मंज़िल को निर्णायक रूप से पूरा करके समाजवादी संक्रमण की मंज़िल में प्रविष्ट हो, इसमें अभी लम्बा समय लगेगा। तब तक क्रान्ति की निरन्तरता के लिए पार्टी की विचारधारात्मक मज़बूती पहली शर्त है। यदि यह शर्त पूरी हुई तो कालान्तर में विश्व परिस्थितियाँ नेपाली क्रान्ति के लिए अधिक अनुकूल हो जायेंगी। विश्व पूँजीवाद के अभूतपूर्व ढाँचागत संकट के सुदीर्घ दौर में अभी जो महाध्वंस जैसी विश्वव्यापी मन्दी का विस्फोट हुआ है, इससे पूरी दुनिया में सर्वहारा क्रान्ति की धारा जल्दी भले ही आगे न बढ़े (क्योंकि इसके लिए हरावल दस्तों की वैचारिक-राजनीतिक-सांगठनिक मज़बूती अनिवार्य है), लेकिन कालान्तर में दुनिया के विभिन्न देशों में व्यापक जन उभारों और जनान्दोलनों का उठ खड़े होना अवश्यम्भावी है। साथ ही, अन्तर- साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का उग्र हो जाना भी वर्तमान संकट की अनिवार्य तार्किक परिणति होगी। ऐसी स्थिति में साम्राज्यवादी शक्तियाँ, भारतीय विस्तारवाद और चीनी ”बाज़ार समाजवाद” नेपाली क्रान्ति को कुचलने के लिए अपनी शक्ति उस हद तक नहीं लगा पायेंगी और अन्तर साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठा पाना भी सम्भव होगा। यदि नेपाली क्रान्ति विचारधारात्मक-राजनीतिक कारणों से भीतर से कमज़ोर या विघटित नहीं हुई तो निकट भविष्य में विश्व परिस्थितियाँ उसके अग्रवर्ती विकास के लिए अधिक अनुकूल होंगी। कहने का मतलब यह कि नेपाल की एकीकृत पार्टी में दक्षिणपन्थी अवसरवादी विचलनों के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष और उस संघर्ष की सफलता पर ही नेपाली क्रान्ति का भविष्य मूलत: और मुख्यत: निर्भर है।
(अगली पोस्ट में जारी)