Friends of Nepalese Revolution/नेपाली क्रान्ति के मित्र

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Posts Tagged ‘नेपाल’

18 को निनु चापागाईं के साथ नेपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य पर बातचीत

Posted by FNR on November 14, 2009

प्रिय साथी,

हम आपको श्री निनु चापागाईं के साथ नेपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक अनौपचारिक बातचीत के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। श्री चापागाईं न सिर्फ़ नेपाल के राजनीतिक आन्दोलन में अहम ज़िम्मेदारियाँ सँभालते रहे हैं बल्कि वहाँ के साहित्यिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की भी एक अहम शख़्सियत हैं।

नेपाल के वरिष्ठतम माक्र्सवादी साहित्यिक आलोचकों में से एक, निनु प्रगतिशील लेखक संघ, नेपाल के अध्यक्ष और प्रगतिशील बुद्धिजीवी संगठन, नेपाल के केन्द्रीय सदस्य हैं। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी हैं और वे प्रमुख नेपाली साहित्यिक पत्रिका ‘वेदना’ के सम्पादक भी हैं। निनु नेपाल के कम्युनिस्ट आन्दोलन में करीब चार दशक से सक्रिय हैं। वे संयुक्त जन मोर्चा (1991-93) के महासचिव रह चुके हैं। इस समय वे एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं तथा पार्टी के संस्कृति विभाग के प्रमुख हैं।

एक नये समाज के निर्माण की जद्दोजहद से गुज़र रहे नेपाल में पिछले कुछ समय से जारी गम्भीर राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक उथल-पुथल पर हम सभी की नज़रें लगी हुई हैं। विडम्बना यह है कि हमारे इतनेे करीब होते हुए नेपाल के बारे में जानकारी के लिए हमें प्रायः दूसरे-तीसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में नेपाल को लेकर हम सबके मन में चल रही बहुतेरी जिज्ञासाओं व प्रश्नों पर निनु के साथ एक दिलचस्प और उपयोगी बातचीत हो सकेगी, ऐसी हमें उम्मीद है। कृपया ज़रूर आयें।

18 नवंबर, 2009; हिंदी भवन विष्णु दिगंबर मार्ग, निकट आईटीओ, नई दिल्ली

सादर,

सत्यम

सचिव, राहुल फ़ाउण्डेशन

 

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Invitation for Discussion with Com. Ninu Chapagain on the literary-cultural-political scenario of Nepal

Posted by FNR on November 14, 2009

Dear friend,

We are inviting you for an informal discussion with Com. Ninu Chapagain on the literary-cultural-political scenario of Nepal. Ninu has been holding important responsibilities in the political movement of Nepal, and he is one of the most prominent figures of Nepal’s literary and cultural movement as well.

One of Nepal’s senior-most Marxist literary critics, Ninu Chapagain has served at different times as Treasurer, General Secretary and President of the Progressive Writers’ Association, an organisation that provides a common platform for anti-imperialist writers and critics. He has also served as President of both the Progressive Cultural Association and Indreni Cultural Society. Author of many books and articles, he is also editor of Vedana, a quarterly journal of criticism and original progressive literature, advisor to Jana Ekta, a weekly newspaper, and other left publications.

Active in Nepal’s communist movement for nearly forty years, Ninu Chapagain has also held a variety of senior party posts. A former General Secretary of United People’s Front (1991-93), he is currently a member of the Politburo of the Unified Nepal Communist Party (Maoist) and heads the cultural department of the party.

Nepali society is in the process of a radical transformation and all of us have been keenly watching the resultant political-social-cultural turmoil. The irony is that most of the time we have to depend on secondary and tertiary sources for information about Nepal. We believe we can have an interesting and fruitful discussion with Ninu on a range of subjects and questions about Nepalese revolution, politics, literature and culture. Please do come.

Satyam

Secretary

Rahul Foundation

 

 

18 November, 2009; 5 PM

Hindi Bhavan, Vishnu Digambar Marg (near ITO), New Delhi

 

Satyam, A-41/2, Yadav Nagar, Samaypur Badli, Delhi-110042

Phone: 9910462009 / 2783 4130, Email: satyamvarma@gmail.com

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नेपाली क्रान्ति : नये दौर की समस्याएँ और चुनौतियाँ, सम्भावनाएँ और दिशाएँ-5

Posted by FNR on August 24, 2009

(पिछली पोस्‍ट से आगे)

ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर संक्रमण काल के कार्यभारों के बारे में ग़लत सोच, रणकौशल को रणनीति बनाने की भूल, और ‘प्रतिस्पर्द्धात्मक संघात्मक गणराज्य’ की दक्षिणपन्थी अवसरवादी लाइन

प्रचण्ड के नेतृत्व में नयी सरकार के सत्तारूढ़ होने के कुछ समय बाद ही संक्रमण की अवधि के बारे में ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर दो दृष्टिकोण उभरकर सामने आये। केन्द्रीय कमेटी के भीतर, प्रचण्ड के नेतृत्व में एक धड़े ने ‘प्रतिस्पर्द्धात्‍मक संघीय गणराज्य’ की स्थापना को तात्कालिक लक्ष्य बनाने की बात कही और ‘लोक जनवादी गणराज्य’ को दूरगामी या रणनीतिक लक्ष्य बताया। मोहन ‘किरन’ वैद्य, सी.पी. गजुरेल, राम बहादुर थापा ‘बादल’ आदि के दूसरे शक्तिशाली धड़े ने इस सोच को दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव बताते हुए कहा कि राजशाही की समाप्ति और संविधान सभा के चुनाव के साथ ही बुर्जुआ ढंग का संघात्मक गणराज्य संस्थाबद्ध हो चुका है और अब हमारा लक्ष्य है लोक गणराज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करना। प्रचण्ड की यह नयी लाइन वस्तुत: बहुदलीय संसदीय जनवादी प्रणाली को सर्वहारा राज्यसत्ता का ‘ऑर्गन’ मानने की ने.क.पा. (माओवादी) की पुरानी सोच का ही नया विस्तारित रूप थी। इस थीसिस के अनुसार, पार्टी को फ़िलहाल संघीय प्रतिस्पर्द्धात्‍मक संसदीय व्यवस्था में ही काम करने की दृष्टि से सरकार चलानी थी और संविधान लिखना था। इसमें अन्तर्निहित था कि सरकार चलाते हुए अपनी जनोन्मुख नीतियों के लिए संघर्ष करते हुए तथा ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुख संविधान-निर्माण के लिए संघर्ष करते हुए ने.क.पा. (माओवादी) जनता के बीच अन्य बुर्जुआ और संशोधनवादी दलों को एक लम्बी प्रक्रिया में अलग-थलग कर देगी और संसदीय चुनावी प्रतिस्पध्र्दा में उन्हें निर्णायक रूप से पीछे छोड़ने के बाद लोक जनवादी गणराज्य की दिशा में आगे क़दम बढ़ायेगी। ज़ाहिर है कि यह शान्तिपूर्ण संक्रमण की लाइन का ही नया रूप था। इस लाइन की जो व्याख्याएँ आ रही थीं, उनसे तथा सरकार में शामिल ने.क.पा. (माओवादी) के मन्त्रियों के कई निर्णयों से इस लाइन का असली चरित्र खुलकर सामने आने लगा था और इसका विरोध भी मुखर होने लगा था।

यह बात स्पष्ट है कि प्रचण्ड के नेतृत्व में ‘प्रॉविज़नल’ सरकार का गठन, राजशाही के ख़ात्मे के बावजूद, राज्यसत्ता-परिवर्तन नहीं है। राज्यसत्ता का मुख्य अंग अभी भी वही सेना है, वही नौकरशाही और वही न्यायपालिका है, बुर्जुआ राज्यसत्ता के मुख्य अवलम्ब के रूप में काम करने वाली धर्मिक संस्थाओं की ताक़त भी फ़िलहाल अक्षुण्ण है, मीडिया पर भी मुख्यत: बुर्जुआ ताक़तें ही हावी हैं और यहाँ तक कि मिली-जुली सरकार में भी संशोधनवादी पार्टियाँ और धुर प्रतिक्रियावादी क्षेत्रीय बुर्जुआ दल शामिल हैं। ज़ाहिर है कि वर्तमान संविधान सभा और मिली-जुली सरकार में भागीदारी एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी पार्टी के लिए अन्तरिम अवधि के अल्पकालिक रणकौशल (टैक्टिक्स) से अधिक कुछ नहीं हो सकता। इसे राज्यसत्ता पर क़ब्ज़ा क़तई नहीं कहा जा सकता। लेकिन पार्टी के विदेश ब्यूरो के सदस्य लक्ष्मण पन्त ने कोइराला वंश का पतनशीर्षक अपने लेख में यह स्थापना दे डाली कि नेपाल में सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग की संयुक्त तानाशाही के रूप में एक नयी राज्यसत्ता अस्तित्व में आ चुकी है, जो मार्क्‍सवादी विज्ञान में एक इज़ाफ़ा है। इस प्रकार लक्ष्मण पन्त ने सरकार को ही राज्यसत्ता बना दिया और नयी सरकार के गठन को नयी राज्यसत्ता का अस्तित्व में आना बता दिया। इस नग्न संशोधनवादी प्रस्थापना वाले लेख का विस्तृत पोस्टमार्टम हम बिगुलके अगस्त-सितम्बर 2008 के अंक में कर चुके हैं। ग़ौरतलब है कि यह लेख ने.क.पा. (माओवादी) के मुखपत्र रेड स्टारके सितम्बर 21-30, 2008 के अंक में भी प्रकाशित हुआ था और इसके विरोध में कोई टिप्पणी नहीं छपी थी।

‘रेड स्टार’ के अंकों में एकाधिक बार यह अहम्मन्यतापूर्ण दावा किया गया है कि लेनिन ने संविधान सभा का जो नारा दिया था, वह अक्टूबर क्रान्ति के बाद पूरा नहीं हुआ था, लेकिन नेपाली क्रान्ति ने उसे पूरा कर दिखाया। लेनिन के समय में संविधान सभा के चुनाव में बहुमत हासिल नहीं कर पाने के बाद उसे भंग कर दिया गया था, लेकिन नेपाल में हमने संविधान सभा में भी जीत हासिल करके सर्वहारा जनवाद की अवधरणा को व्यवहार में आगे विकसित किया है। इस बड़बोलेपन के दिवालियेपन और संशोधनवादी चरित्र पर ग़ौर करना ज़रूरी है। लेनिन के समय में संविधान सभा बनाम सोवियत का प्रश्न बुर्जुआ राज्यसत्ता के बलपूर्वक ध्‍वंस के बाद पैदा हुआ था। बोल्शेविकों के सामने प्रश्न था कि नयी सर्वहारा सत्ता का, सर्वहारा जनवाद का, या यूँ कहें कि सर्वहारा अधिनायकत्व का मुख्य ‘ऑर्गन’ क्या होगा? सैद्धान्तिक तौर पर बहुदलीय संसदीय जनतन्त्र को बोल्शेविक पहले ही ख़ारिज़ कर चुके थे। संविधान सभा को नयी सर्वहारा सत्ता का एक ‘ऑर्गन’ बनाने के बारे में कुछ समय तक उन्होंने सोचा था, लेकिन फिर जल्दी ही वे इस नतीजे पर पहुँचे कि सोवियतें ही सर्वहारा सत्ता का मुख्य ‘ऑर्गन’ होंगी, वे विधयिका और कार्यपालिका दोनों की भूमिका निभायेंगी तथा उनके चुनाव में शोषक वर्गों की कोई भागीदारी नहीं होगी। दो वर्षों के अनुभव के बाद बोल्शेविक पार्टी इस नतीजे पर पहुँची कि सोवियतों के माध्‍यम से शासन चलाने या सर्वहारा अधिनायकत्व लागू करने में पार्टी की संस्थाबद्ध नेतृत्वकारी भूमिका होगी तथा ट्रेडयूनियनों की भूमिका राज्यसत्ता की ”आरक्षित शक्ति” की या शासन चलाने के प्रशिक्षण केन्द्र की होगी। ने.क.पा. (माओवादी) इस बात को भूल जाती है कि नेपाल में संविधान सभा का प्रश्न राज्यसत्ता के बलात ध्‍वंस के बाद नहीं उठा है। यह वर्ग-संघर्ष में रणनीतिक शक्ति-सन्तुलन की संक्रमण-अवधि के दौरान एक अन्तरिम समझौते की व्यवस्था के रूप में सामने आया है और ऐसी संविधान सभा के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना इतनी बड़ी क्रान्तिकारी उपलब्धि नहीं है, जिसके आधार पर बोल्शेविक पार्टी के अनुभवों के समाहार को संशोधित करने और मार्क्‍सवादी विज्ञान में इज़ाफ़ा करने का दावा ठोंक दिया जाये। ऐसा वही कर सकता है जो शान्ति समझौते और संविधान सभा के चुनाव को अक्टूबर क्रान्ति की तरह राज्यसत्ता परिवर्तन की घटना माने। कहना नहीं होगा कि यह बेहद सतही किस्म की संशोधनवादी समझ ही हो सकती है।

सरकार में भागीदारी के रणकौशलात्मक इस्तेमाल के बजाय ”सरकार चलाने” का दक्षिणपन्थी भटकाव

मिली-जुली अन्तरिम सरकार के भीतर नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए ने.क.पा. (माओवादी) के प्रतिनिधियों का जो आचरण रहा है, उसमें से भी दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव की स्पष्ट दुर्गन्ध आती रही है। सरकार में शामिल होते समय ने.क.पा. (माओवादी) के सामने तीन स्पष्ट कार्यभार थे : पहला, ज्यादा से ज्यादा जनपक्षधर संविधान बनाना, दूसरा, शान्ति-प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुँचाना और तीसरा, सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिवर्तन या राज्य और समाज के पुनर्गठन के लिए प्रयास करना। इन तीनों कार्यभारों की बुनियादी अन्तर्वस्तु एक थी और वह यह कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को अधिकतम सम्भव तेज़ और रैडिकल ढंग से पूरा करने के लिए बुर्जुआ वर्ग के ऊपर दबाव बनाया जाये, इस प्रक्रिया में उनके चरित्र को और बुर्जुआ जनवाद की सीमाओं को जनता के सामने ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया जाये, बुर्जुआ वर्ग को ज्यादा से ज्यादा अलग-थलग किया जाये, जनयुद्ध की उपलब्धियों को और वैकल्पिक सत्ता केन्द्रों को यथासम्भव सुरक्षित रखते हुए अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया जाये, जनान्दोलनों के द्वारा मेहनतकश वर्गों की पहलक़दमी और क्रान्तिकारी सक्रियता को बरकरार रखा जाये तथा बुर्जुआ वर्ग के साथ फ़ौरी समझौते की इस अवधि के समाप्त होते ही लोक जनवादी गणराज्य की स्थापना के निर्णायक संघर्ष की सर्वतोमुखी तैयारी को कमान में रखकर ही अपनी सारी कार्रवाइयाँ संचालित की जायें। लेकिन व्यवहारत: देखने में यह आया कि संविधान निर्माण और भूमि-सुधर, रोज़गार के अधिकार, मज़दूरों के अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि के अधिकार को मूल नागरिक अधिकार बनाने को लेकर संविधान सभा के भीतर और बाहर प्रयास करने के बजाय माओवादियों ने मुख्य ज़ोर सरकार चलाने पर दिया। उन्होंने बुर्जुआ दलों को ‘एक्सपोज़’ करके अपना जन-समर्थन मज़बूत करने के बजाय सरकार के बुर्जुआ विकास के क़दमों और शासकीय ”कल्याणकारी,” ”विकास” की कार्रवाइयों द्वारा अपना सामाजिक आधार मज़बूत करने का सुधरवादी रास्ता चुना। प्रधनमन्त्री प्रचण्ड और वित्तमन्त्री बाबू राम भट्टराई लगातार पूँजीपतियों को आश्वस्त करते रहे कि उन्हें पूँजी लगाने (यानी मेहनतकशों को निचोड़ने) का पूरा अवसर मिलेगा क्योंकि नेपाली क्रान्ति का आज का कार्यभार है सामन्ती निरंकुश सामाजिक ढाँचे को पूँजीवादी जनवादी ढाँचे में रूपान्तरित करना। सितम्बर में बाबू राम भट्टराई ने जो बजट पेश किया उसमें भारत और चीन की विकास-परियोजनाओं की तर्ज पर ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ पर बल दिया गया। वैसे कहने के लिए उन्होंने सहकारिता को अर्थव्यवस्था का दूसरा स्तम्भ बताया, लेकिन ज़ाहिर है कि यह महज़ एक रस्मी बात थी। मौजूदा नौकरशाही तन्त्र और सामाजिक-आर्थिक ढाँचे के अन्तर्गत नेपाल में केवल बुर्जुआ ढंग की सहकारिता ही विकसित हो सकती है। जहाँ तक जनता के क्रान्तिकारी सहकारिता आन्दोलन की बात है, शासकीय कार्रवाइयों पर ही मुख्य बल देने के कारण देहात के पुराने मुक्त क्षेत्रों में लोकसत्ता के जो प्रारम्भिक रूप विकसित हुए थे, जब वे ही आज ठहराव और विघटन का शिकार हो रहे हैं तथा जन पहलक़दमी कुन्द हो रही है, तो आम जनता का सहकारी आन्दोलन भला कैसे आगे विकसित हो सकता है? स्पष्ट है कि ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर जो दक्षिणपन्थी धड़ा रहा है, वह संविधान-लेखन और सरकार चलाने की प्रक्रिया में बुर्जुआ जनवाद की सीमाओं को एक्सपोज़ करके नवजनवादी क्रान्ति के लिए जनलामबन्दी को आगे बढ़ाने के बजाय लोकप्रिय सुधरवादी शासकीय क़दमों से लोकप्रियता अर्जित करके आगामी चुनावों में सफलता की गारण्टी चाहता है, वह नीचे से नहीं बल्कि ऊपर से (यानी सरकार के ज़रिये) जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा करना चाहता है और इस प्रक्रिया में वर्ग-संघर्ष को नहीं बल्कि उत्पादक शक्तियों के विकास को कुंजीभूत कड़ी बनाकर अपनी भूमिका तय कर रहा है। यह माओवाद नहीं, बल्कि देङवाद है।

सरकार में रहते हुए हर सम्भव जनकल्याणकारी क़दम उठाते हुए माओवादी यदि सतत प्रचार की कार्रवाई द्वारा जनता को बुर्जुआ जनवाद की सीमाओं से अवगत कराते रहते और उनका मुख्य ज़ोर आर्थिक विकास के बजाय यदि जन संघर्षों को आगे बढ़ाने पर होता, तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होती। लेकिन यहाँ तो मामला ही उलटा है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज (‘रेड स्टार’ में ही छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़) रोल्पा के पुराने आधार क्षेत्र की जनता यह सोचने लगी है कि माओवादी भी अब अपना क्रान्तिकारी लक्ष्य भूलकर काठमाण्डू की कुलीनतावादी संसदीय पार्टियों के सहयात्री बन चुके हैं। मामले की गम्भीरता तब और बढ़ जाती है, जब पता चलता है कि विगत 27 जनवरी को मन्त्रिमण्डल ने दो अध्‍यादेश जारी करके एक निवेश बोर्ड का गठन किया और एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (‘सेज’) को मंजूरी दे दी। इसके पहले 16 जनवरी को नेपाली कांग्रेस को छोड़कर छह बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बीच इस बात पर आम सहमति बनी कि कुछ बुनियादी सेवा क्षेत्रों में हड़ताल पर रोक लगा दी जाये। इन क्षेत्रों में अस्पताल, यातायात और कस्टम ऑफ़िसों के अतिरिक्त उद्योगों को भी रखा गया है। उल्लेखनीय है कि विकास के नाम पर हड़ताल का अधिकार छीनने के निर्णय में माओवादी उस देश में भागीदार बन रहे हैं जहाँ 1995 में पहली बार जो श्रम क़ानून बने वे केवल 6 प्रतिशत मज़दूरों पर लागू होते हैं। विगत दिसम्बर में न्यूनतम वेतन लागू करने की माँग को लेकर नेपाल के 20,000 जूट मिल मज़दूरों ने जुझारू आन्दोलन चलाया था। अब विकास के नाम पर माओवादियों के नेतृत्व वाली सरकार मज़दूरों से यह अधिकार भी छीन लेना चाहती है। सर्वहारा वर्ग की पहलक़दमी को समाप्त करने वाले इस निर्णय को किसी भी रणकौशल के नाम पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। यहाँ पर नेपाल के कॉमरेडों को इतिहास की एक बहस की याद दिलाना हम ज़रूरी समझते हैं। समाजवादी संक्रमण के दौर में भी लेनिन मज़दूरों को ट्रेडयूनियनों के माध्‍यम से संघर्ष का अधिकार देने के उत्कट पक्षधर थे। त्रात्स्की और बुखारिन द्वारा ट्रेडयूनियनों के सरकारीकरण के प्रस्ताव का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि चूँकि सर्वहारा अधिनायकत्व की शासकीय मशीनरी के भीतर बुर्जुआ और नौकरशाहाना विकृतियाँ मौजूद हैं, इसलिए मज़दूर वर्ग को ट्रेडयूनियनों के ज़रिये अपने अधिकारों की हिफाजत के लिए संघर्ष का अधिकार होना चाहिए। यानी जब टे्रड यूनियनों के हड़ताल के अधिकार को समाजवादी संक्रमण के दौर में भी नहीं छीना जा सकता, तो नेपाल की मिली-जुली प्रॉविज़नल सरकार में शामिल माओवादियों द्वारा विकास के नाम पर उठाये गये इस क़दम को सही भला कैसे सिद्ध किया जा सकता है? यदि क्रान्ति के व्यापक हित में यह ज़रूरी भी था, तो माओवादियों को मज़दूर वर्ग के बीच पार्टी के राजनीतिक वर्चस्व और साख के आधार पर उसे हड़ताल न करने के लिए तैयार करना चाहिए था, न कि बुर्जुआ पार्टियों के साथ आम सहमति बनाकर ऊपर से लादे गये किसी शासकीय निर्णय के द्वारा।

सेनाओं के विलय का सवाल : कुछ शंकाएँ और कुछ सवाल

इसी सम्बन्ध में कुछ और अहम मुद्दों पर भी विचार करना ज़रूरी है। नेपाल की वर्तमान सेना (जो भूतपूर्व शाही सेना है) के साथ जनमुक्ति सेना का विलय करके एक राष्ट्रीय सेना के निर्माण पर माओवादी काफ़ी बल देते रहे हैं, जो कि शान्ति समझौते की एक शर्त रही है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह क़दम क्रान्ति के हक़ में ही हो। परस्पर विरोधी वर्ग-चरित्र वाली इन दोनों सेनाओं की सारभूत एकता सम्भव ही नहीं। यह केवल एक रणकौशलात्मक क़दम ही हो सकता है जिसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जनमुक्ति सेना की विचारधारात्मक-राजनीतिक तैयारी कितनी पुख्ता है और बुर्जुआ सेना के ज्यादा से ज्यादा आम जवानों को क्रान्ति के पक्ष में जीत लेने में वह किस हद तक सक्षम है! यदि ये दोनों शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो विलय की प्रक्रिया जनमुक्ति सेना के बड़े हिस्से को भी पतित करके एक बुर्जुआ सेना में तब्दील कर सकती है और जनता तथा जनयुद्ध के दौर की सारी उपलब्धियों को अरक्षित करके बुर्जुआ वर्ग के रहमोकरम पर छोड़ सकती है। इस आशंका के पीछे एक मज़बूत आधार है। जनमुक्ति सेना की क़तारों में अतीत में ऐसे सैन्यवादी और अराजकतावादी भटकाव देखने को मिलते रहे हैं जो राजनीतिक शिक्षा के अभाव के प्रमाण रहे हैं। ऐसी सेना के एक बड़े हिस्से का यदि बुर्जुआकरण हो जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। आज पीछे मुड़कर देखने पर इस बात पर भी विचार करना ज़रूरी लगता है कि जिन दिनों जनयुद्ध शिखर पर था उन दिनों में भी शाही सेना की क़तारों में कोई विद्रोह क्यों नहीं हुआ? यह ख़बर भी यदि सही है तो विचारणीय है कि कैण्टोनमेण्ट में रहने के दौरान, विगत एक वर्ष के दौरान जनमुक्ति सेना के एक हिस्से में निराशा भी फैलती रही है और कुछ मुक्ति योद्धा घरों को वापस भी लौटते रहे हैं।

हमारा मानना है कि शान्ति समझौते के दौरान पूरी जनमुक्ति सेना को अपने हथियार संयुक्त राष्ट्र संघ के मिशन की देखरेख में सौंपना और कैण्टोनमेण्ट में रहना यदि ज़रूरी था, तो भी पार्टी को जनता के बीच से आत्मरक्षार्थ स्वयंसेवक दस्तों और जन मिलिशिया के रूप में नये सिरे से जनसमुदाय को हथियारबन्द करने की प्रक्रिया चलानी चाहिए थी। अव्वलन तो होना यह चाहिए था कि जनमुक्ति सेना के एक हिस्से को ऊपरी तौर पर विघटित करके जनता के बीच फैला दिया जाता, लेकिन हम नहीं जानते कि ऐसा सम्भव था या नहीं।

पूरी पार्टी को खुला करने का प्रश्न और हमारी शंकाएँ

हमारा यह भी मानना है कि संविधान सभा चुनावों में भागीदारी से लेकर सरकार में भागीदारी तक के पूरे दौर में, पूरी पार्टी को खुला और क़ानूनी बनाना किसी भी रूप में उचित नहीं है। न केवल ने.क.पा. (माओवादी) चुनाव के समय से खुली रही है, बल्कि विलय के पहले ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) ने भी जनमोर्चा को भंग करके पूरे केन्द्रीय नेतृत्व समेत पूरी पार्टी को खुला करने की घोषणा की। हमारा मानना है कि प्रॉविज़नल सरकार की वर्तमान संक्रमण अवधि का रणकौशल के रूप में इस्तेमाल करते हुए, पार्टी के भूमिगत ढाँचे को बनाये रखा जाना चाहिए तथा उसके एक हिस्से को ही बुर्जुआ जनवाद की परिस्थितियों के भरपूर इस्तेमाल के लिए खुला किया जाना चाहिए।

क्रान्तिकारी वैकल्पिक सत्ता की मौजूदगी और विकास ज़रूरी है!

वेनेजुएला में ह्यूगो शावेज़ की सत्ता निश्चय ही कोई समाजवादी सत्ता नहीं है। शावेज़ का ”समाजवाद” ”पेट्रो डॉलर समाजवाद” है और अब शावेज़ के अनुयाइयों के बीच से भी एक नया नौकरशाहाना बुर्जुआ वर्ग उभर रहा है। लेकिन साम्राज्यवादियों और देशी बड़े पूँजीपतियों की मर्जी के विपरीत, शावेज़ के सत्ता में अब तक टिके रहने का मूल कारण यह है कि नौकरशाही और मीडिया पर बुर्जुआ जकड़बन्दी के बावजूद, ग्रास रूट स्तर पर वहाँ तमाम जन संस्थाएँ वैकल्पिक सत्ता केन्द्र के रूप में मौजूद हैं और सेना के बड़े हिस्से के बीच शावेज़ का मज़बूत समर्थन-आधार है। वहाँ कमोबेश दोहरी सत्ता जैसी स्थिति बनी हुई है। सीमित सन्दर्भों में इस उदाहरण से नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के लिए कुछ ज़रूरी सबक़ निकलते हैं। नेपाली क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास के लिए ज़रूरी है कि नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी अन्तरिम सरकार चलाते हुए भी सतत क्रान्तिकारी प्रचार एवं उद्वेलन की कार्रवाई के ज़रिये जनसमुदाय को मौजूदा सत्ता-संरचना की सीमाओं से परिचित कराते रहें, जन पहलक़दमी को लगातार जागृत करके, पुराने मुक्त क्षेत्रों के आधार का इस्तेमाल करते हुए, ग्रासरूट स्तर पर तरह-तरह की जनसंस्थाओं के रूप में वैकल्पिक क्रान्तिकारी सत्ता केन्द्र विकसित करें और दोहरी सत्ता की स्थिति पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ें। केवल तभी आने वाले दिनों में आम जनविद्रोह को प्रधन पहलू बनाते हुए राज्यसत्ता पर निर्णायक क़ब्ज़ा किया जा सकेगा और सर्वहारा जनवाद का यदि कोई रूप विकसित होना भी होगा तो वह इसी प्रक्रिया में विकसित होगा।

”कुछ विश्व ऐतिहासिक” करने की बेचैनी पिछड़े समाज की कूपमण्डूकता की उपज है!

बहुदलीय प्रणाली को नेपाली क्रान्ति के अभी तक के अनुभवों के आधार पर सर्वहारा जनवाद का ‘ऑर्गन’ घोषित कर देना निहायत अपरिपक्व निर्णय है और अधकचरे ढंग से अतीत के महान सामाजिक प्रयोगों के अनुभवों के समाहार को ख़ारिज़ करना है। वर्तमान मिली-जुली सरकार सर्वहारा अधिनायकत्व या जनता के जनवादी अधिनायकत्व के दौर की सरकार नहीं है। इसमें भागीदारी अल्पकालिक रणकौशल मात्र है। जब तक नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी जनता के जनवादी अधिनायकत्व के अन्तर्गत बहुदलीय व्यवस्था को चलाने का कोई सफल प्रयोग न कर लें, तब तक ऐसे किसी विचारधारात्मक इज़ाफ़े की बात ख़याली पुलाव पकाने के समान है। दरअसल, कुछ ”विश्व ऐतिहासिक” करने की बेचैनी ने.क.पा. (माओवादी) में कुछ ज्यादा ही दीखती रही है। नेतृत्व में मौजूद राजनीतिक कैरियरवाद के साथ ही यह पिछड़े समाज की कूपमण्डूकता की देन है। प्राय: यह देखा जाता है कि पिछड़े समाजों में लोग ”दुनिया की सबसे बड़ी” या ”सबसे अनूठी” चीज़ों के अपने आसपास होने का दावा करते रहते हैं। ‘प्रचण्ड पथ’ का आविष्कार भी इसी बेचैनी की देन है, जिसकी आलोचना ‘बिगुल’ में पहले की जा चुकी है। नेपाली क्रान्ति को इक्कीसवीं शताब्दी की नयी सर्वहारा क्रान्तियों का प्रस्थान बिन्दु बताना और आने वाले दिनों की क्रान्तियों के लिए राह दिखाने का दावा करना भी एक बचकानापन ही है। सामाजिक-आर्थिक संरचना के पिछड़ेपन की दृष्टि से, नेपाली क्रान्ति बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की ही अगली कड़ी है। यह गत शताब्दी का छूटा हुआ कार्यभार है जो वर्तमान शताब्दी में पूरा हो रहा है। हर देश की क्रान्तिकारी परिस्थितियों की अपनी कुछ मौलिकता-नवीनता होती है और हर क्रान्ति अपने आप में महान होती है। उसे बलपूर्वक महान सिद्ध करने के लिए ‘ट्रेण्ड सेटर’ और ‘पाथ-ब्रेकिंग’ बताना कूपमण्डूकता के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। सर्वहारा जनवाद की अब तक की अवधरणा में विकास और संविधान सभा के प्रयोग के अनूठेपन का दावा भी इसी कूपमण्डूकता की देन है। इसी कूपमण्डूकता के चलते ने.क.पा. (माओवादी) अतीत की महान क्रान्तियों के अनुभवों की तो बचकाने ढंग से कमियाँ निकालती है, लेकिन नववामपन्थी ”मुक्त चिन्तन” उसे काफ़ी प्रभावित करता है। सर्वहारा क्रान्तियों के इतिहास की हास्यास्पद ढंग से छीछालेदर करने वाला रौशन किस्सून का लेख हो या समीर अमीन का लम्बा साक्षात्कार, पार्टी मुखपत्र में उन्हें छापने के बाद न तो कोई बहस चलायी जाती है, न ही कोई आलोचनात्मक टिप्पणी दी जाती है। इस क़िस्म की ”ग़ैरपक्षधर वस्तुपरकता” पार्टी के विचारधारात्मक भटकाव का ही जीता-जागता प्रमाण है।

ने.क.पा. (माओवादी) के मुखपत्र में विचारधारात्मक भटकाव के नमूने

उल्लेखनीय यह भी है कि ने.क.पा. (माओवादी) ने एक वर्ष से भी अधिक समय के दौरान अपने मुखपत्र ‘रेड स्टार’ में सांस्कृतिक क्रान्ति, माओवाद, देघ के ”बाज़ार समाजवाद” या पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बारे में कोई भी विचारधारात्मक सामग्री नहीं छापी है। चीन की आर्थिक-सामाजिक प्रगति दर्शाने वाले विवरण या चीनी पार्टी द्वारा नेपाली क्रान्ति की और ‘प्रचण्ड की पार्टी’ की प्रशंसा की ख़बरें, क्यूबा की क्रान्ति की वर्षगाँठ और प्रगति की ख़बरें ज़रूर देखने को मिलती हैं। किसी भी देश के साथ कूटनीतिक रिश्तों को विचारधारा से सर्वथा अलग करके देखना चाहिए। पार्टी मुखपत्र कूटनीति का नहीं बल्कि विचारधारात्मक प्रचार और संघर्ष का साधन होता है। ‘रेड स्टार’ में छपी एक रपट में कोरिया में समाजवाद की प्रगति की और ”जुछे विचारधारा” की मुक्त कण्ठ से तारीफ़ की गयी है। कोरिया की कम्युनिस्ट पार्टी आज संशोधनवाद के रास्ते पर काफ़ी दूर निकल आयी है। उसके दस्तावेज़ों के अध्ययन से यह बात एकदम स्पष्ट है। लेकिन ने.क.पा. (माओवादी) यदि उसे अभी भी क्रान्तिकारी पार्टी मानती है तो यह या तो स्वयं उसका ही गम्भीर भटकाव है या फिर हद दर्जे की नासमझी है।

ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर दक्षिणपन्थी अवसरवादी लाइन के विरुद्ध

संघर्ष और उसके सकारात्मक नतीजे

जैसा कि हमने ऊपर भी उल्लेख किया है, सकारात्मक बात यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर दक्षिणपन्थी अवसरवादी प्रवृत्ति के विरुद्ध केन्द्रीय कमेटी से लेकर नीचे तक तीखा संघर्ष सितम्बर 2008 से लगातार जारी था। हालाँकि दूसरा पक्ष भी कई मसलों पर स्पष्ट नहीं है और कहीं-कहीं खुद भी ”वाम” या दक्षिण की विच्युति का शिकार है, लेकिन मुख्य पहलू की दृष्टि से उसकी अवस्थिति सही रही है।

पार्टी के भीतर दो लाइनों के संघर्ष का शिखर बिन्दु था, काठमाण्डू के निकट खारीपाती में 21 नवम्बर 2008 से शुरू हुआ छह दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन। इस कन्वेंशन में प्रचण्ड ने अपने दस्तावेज़ में प्रतिस्पर्द्धात्‍मक संघात्मक गणराज्य की लाइन रखी, जबकि किरण वैद्य ने लोक गणराज्य की लाइन रखी। लम्बी बहस के बाद ‘लोक संघात्मक जनवादी राष्ट्रीय गणराज्य’ के नारे पर आम सहमति बनी। संक्षेप में इसे ‘लोक गणराज्य’ ही कहने का निर्णय लिया गया। हालाँकि यह एक समझौता फ़ार्मूला था, लेकिन मुख्यत: यह दक्षिणपन्थी अवसरवादी लाइन की पराजय थी। प्रचण्ड के नेतृत्व वाला धड़ा संविधान सभा और सरकार में भागीदारी के ज़रिये प्रतिस्पर्द्धात्‍मक संघात्मक गणराज्य को मज़बूत बनाने पर बल दे रहा था, लेकिन कन्वेंशन ने आधिकारिक पार्टी लाइन यह तय की कि सड़क, संविधान सभा और सरकार इन तीनों मोर्चों पर व्यापक संघर्ष करते हुए पार्टी लोक गणराज्य की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ेगी, जिसमें सड़क का मोर्चा प्रमुख मोर्चा होगा। इस प्रकार संसदीय मार्ग पर जनसंघर्ष के मार्ग को प्रमुखता दी गयी। निश्चय ही, यह क्रान्तिकारी लाइन की एक जीत थी, लेकिन जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, इस कन्वेंशन के बाद भी अध्‍यादेश द्वारा सेज की स्थापना और हड़ताल पर रोक जैसे कई ऐसे क़दम माओवादी नेतृत्व वाली सरकार ने उठाये, जिनमें दक्षिणपन्थी रुझान की मौजूदगी देखी जा सकती है।

खारीपाती राष्ट्रीय कन्वेंशन सकारात्मक दिशा में एक महत्त्‍वपूर्ण क़दम था। इसके तत्काल बाद ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) के बीच जारी एकता-प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ी। लोक गणराज्य की स्थापना के लिए संघर्ष की लाइन पर एकता केन्द्र-मसाल की भी सहमति थी। मई-जून 2008 में बिगुलमें प्रकाशित लेख में हम इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि एकता केन्द्र-मसाल माओवादियों के ”वामपन्थी” और दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकावों के विरुद्ध पहले भी संघर्ष करता रहा था। इस तथ्य का उल्लेख भी किया गया है कि बुनियादी मतभेदों के हल होने के साथ ही दोनों पार्टियों के बीच एकता की प्रक्रिया संविधान सभा चुनावों के पहले ही शुरू हो चुकी थी, पर चुनाव और उसके बाद की परिस्थितियों में इसकी गति शिथिल पड़ गयी थी।

ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) के बीच एकता और क्रान्तिकारी ध्रुवीकरण की प्रक्रिया की तेज़ गति

विगत 8-9 दिसम्बर को ने.क.पा. (माओवादी) ने एक और राष्ट्रीय सम्मेलन किया, जिसमें कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को एक पार्टी में एकताबद्ध करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए, एकता केन्द्र-मसाल के साथ एकता का प्रस्ताव पारित किया गया, लेकिन साथ ही उससे माओवाद को पार्टी के मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में स्वीकारने का आग्रह भी किया गया। ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) का दूसरा राष्ट्रीय कन्वेंशन 30-31 दिसम्बर 2008 और 1 जनवरी 2009 को सम्पन्न हुआ। कन्वेंशन ने सर्वसम्मति से राजनीतिक रिपोर्ट के साथ ही पार्टी एकता का प्रस्ताव भी पारित किया। उक्त कन्वेंशन के निर्णय के अनुसार 3 जनवरी को पार्टी के क़ानूनी मोर्चा जनमोर्चा, नेपाल को भंग कर दिया गया और 6 जनवरी को पोलित ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी सहित पूरी पार्टी को सार्वजनिक करने की घोषणा एक प्रेस कॉफ्रेंस में की गयी (पूरी पार्टी खुली करने के प्रश्न पर हम अपनी राय ऊपर दे चुके हैं)। इस प्रेस कॉफ्रेंस में ने.क.पा. (माओवादी) के साथ एकता के निर्णय की घोषणा भी की गयी। उपरोक्त कन्वेंशन के पहले ही एकता केन्द्र ने ने.क.पा. (माओवादी) को सूचित कर दिया था कि वह पहले की साझा सहमति की इस अवस्थिति पर अभी भी क़ायम है कि नयी एकीकृत पार्टी के मार्गदर्शक सिद्धान्त के रूप में माओवाद/माओ विचारधारा लिखा जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि पार्टी एकता के लिए एक तालमेल कमेटी विगत लगभग एक वर्ष से काम कर रही थी जिसमें ने.क.पा. (माओवादी) की ओर से प्रचण्ड, बाबूराम भट्टराई, किरण, बादल, कृष्णबहादुर महरा, पोस्टबहादुर बोगती और एकता केन्द्र-मसाल की ओर से प्रकाश, अमिक सेरचन, निनु चपागाईं, गिरिराज मणि पोखरेल, लीलामणि पोखरेल और भीम प्रसाद गौतम शामिल थे। इस तालमेल कमेटी की बैठक में एकीकृत पार्टी के लिए अन्तरिम राजनीतिक रिपोर्ट का मसौदा प्रचण्ड ने और आगामी राष्ट्रीय कांग्रेस तक नयी एकीकृत पार्टी के संचालन के लिए सांविधिक नियमावली का मसौदा प्रकाश ने तैयार किया। तालमेल कमेटी ने उन्हें अन्तिम रूप दिया और फिर दोनों पार्टियों की केन्द्रीय कमेटियों ने उन्हें पारित किया।

12 जनवरी 2009 को दोनों पार्टियों की केन्द्रीय कमेटियों की संयुक्त बैठक हुई जिसमें ने.क.पा. (माओवादी) की 106 सदस्यीय केन्द्रीय कमेटी और ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) की 31 सदस्यीय केन्द्रीय कमेटी को मिला देने के साथ ही एकीकरण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हो गयी। यह तय किया गया कि 137 सदस्यीय नयी केन्द्रीय कमेटी की सदस्य संख्या कुछ और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के साथ एकता के बाद बढ़ाकर 175 तक की जा सकती है। यह भी निर्णय लिया गया कि वर्तमान केन्द्रीय कमेटी ही आगामी राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए आर्गेनाइजिंग कमेटी का भी काम करेगी। नयी पार्टी का नाम एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) रखा गया, जिसका मार्गदर्शक सिद्धान्त मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद-माओवाद/माओ विचारधारा बनाया गया। प्रचण्ड पथ को मार्गदर्शक सिद्धान्त से हटा दिया गया लेकिन इस प्रश्न पर तथा माओवाद/माओ विचारधारा के प्रश्न पर पार्टी के भीतर आम सहमति पर पहुँचने की दृष्टि से आन्तरिक बहस का निर्णय लिया गया। प्रचण्ड को सर्वसम्मति से पार्टी-चेयरमैन चुना गया।

13 जनवरी को टुण्डीखेल, काठमाण्डू में हुई एक जनसभा में पार्टी एकता की सार्वजनिक घोषणा की गयी। 15 जनवरी को नयी पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की दूसरी बैठक हुई।

पोलित ब्यूरो और सेक्रेटेरियट के गठन के बाद नयी पार्टी के नेतृत्व के बीच सांगठनिक ज़िम्मेदारियों के बँटवारे, नीचे की कमेटियों तक के एकीकरण तथा सभी जनसंगठनों के एकीकरण की प्रक्रिया जनवरी के पूरे महीने चलती रही और यह सिलसिला अभी भी जारी है।

कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच एकता की यह प्रक्रिया अभी और आगे बढ़ने वाली है। इस क्रम में अगली एकता नवराज शर्मा के नेतृत्व वाले ने.क.पा. (मा-ले, क्रान्तिकारी) से होनी है। यह सी.पी. मैनाली के नेतृत्व वाली संशोधनवादी पार्टी ने.क.पा. (मा-ले) से अलग होकर क्रान्तिकारी अवस्थिति अपनाने वाला एक संगठन है, जो ने.क.पा. (माओवादी) के साथ एकता का निर्णय पहले ही ले चुका था। अब यह एकता भी जल्दी ही सम्पन्न हो जायेगी।

एक दूसरे महत्तवपूर्ण कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन ने.क.पा. (एकीकृत) के साथ भी एकता की कोशिशें जारी हैं। उक्त संगठन के नेतृत्व के एक सदस्य नवराज सुबेदी इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि पूरा संगठन एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के साथ एकता कर ले। यदि ऐसा सम्भव नहीं हो सका तो भी नवराज सुबेदी कुछ अन्य लोगों के साथ नयी एकीकृत पार्टी में शामिल हो जायेंगे। जो भी होना होगा, वह मार्च तक हो जायेगा।

कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता की यह जारी प्रक्रिया नेपाली जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप है। नेपाली क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास के लिए ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर के दो लाइनों के संघर्ष में दक्षिणपन्थी भटकाव के फ़ौरी तौर पर पीछे हट जाने या कमज़ोर पड़ जाने की घटना और एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के गठन की घटना इन दोनों का अत्यधिक महत्तव है। इस समय नेपाल में दक्षिण और वाम के शिविरों में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया काफ़ी तेज़ है। एक माह के भीतर ने.क.पा. (एमाले) भी अपनी राष्ट्रीय कांग्रेस करने वाली है। यह पार्टी अब एकदम खुले तौर पर सामाजिक जनवादी रंग में रँग चुकी है। सी.पी. मैनाली के नेतृत्व वाली ने.क.पा. (मा-ले) व्यवहार में नेपाली कांग्रेस के निकट है। नेपाली कांग्रेस भूतपूर्व राजतन्त्रवादी पार्टियों तक को साथ लेकर तथाकथित जनवादी मोर्चा संगठित करने का नारा दे रही है। एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) सभी राष्ट्रीय और गणराज्यवादी शक्तियों के साथ संयुक्त मोर्चे का नारा दे रही है। भविष्य में बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियों की क़तारों से छिटककर कुछ लोग ऐसे मोर्चे में शामिल हो सकते हैं। नेपाली कांग्रेस, एमाले, मधेसी जनाधिकार फ़ोरम इन सभी पार्टियों में आन्तरिक अन्तरविरोध गहरा रहे हैं।

ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुखसंविधान-निर्माण और रैडिकल भूमि-सुधर जैसे प्रश्नों पर इस ध्रुवीकरण का तीखा होना निश्चित है। ऐसी स्थिति में, ज़ाहिर है कि वर्ग-संघर्ष का मुख्य मंच संविधान सभा और सरकार नहीं, बल्कि सड़क ही बनेगा। सड़कों पर उठने वाला जनान्दोलन का नया ज्वार संसद के भीतर भी प्रतिक्रियावादी ताक़तों पर दबाव बनायेगा। नेपाल की जनवादी क्रान्ति किन चढ़ावों-उतारों से होकर आगे बढ़ेगी, इसका ठीक-ठीक पूर्वानुमान तो अभी से नहीं लगाया जा सकता। लेकिन इतना विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यदि क्रान्ति के हरावल दस्ते की एकजुटता बनी रही और वह दक्षिणपन्थी और ”वामपन्थी” अवसरवादी विचलनों पर दो लाइनों के संघर्ष के ज़रिये विजय हासिल करता रहा तो कठिनतम वस्तुगत परिस्थितियाँ भी क्रान्ति की अग्रगति को कुछ समय के लिए बाधित भले ही कर दें, लेकिन उसका गला नहीं घोंटा जा सकता। विचारधारात्मक रूप से दृढ़, एकीकृत और जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरी उतरने वाली पार्टी के नेतृत्व में क्रान्ति की विजय काफ़ी हद तक सुनिश्चित होती है, चाहे उसका रास्ता जितना भी लम्बा और कठिन क्यों न हो!

(3 फ़रवरी, 2009)

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नेपाली क्रान्ति : नये दौर की समस्याएँ और चुनौतियाँ, सम्भावनाएँ और दिशाएँ-4

Posted by FNR on August 10, 2009

(पिछली पोस्‍ट से आगे)

नेपाली क्रान्ति अभी भी रणनीतिक सन्तुलन की ही मंज़िल में है,

रणनीतिक आक्रमण की मंज़िल अभी दूर है

1996 से 2006 तक जारी जनयुद्ध के दौरान जनमुक्ति सेना ने देश के लगभग 80 प्रतिशत देहाती क्षेत्र को मुक्त करा लिया था। मुक्त क्षेत्र में समान्तर राज्यतन्त्र खड़ा करने का काम भी गति पकड़ चुका था। सड़क, स्कूल, अस्पताल बनाने, उत्पादन एवं विनिमय के क्षेत्र में सहकारिता-आन्दोलन संगठित करने और क्रान्तिकारी अदालतों द्वारा भ्रष्ट एवं जालिम भूस्वामियों को दण्डित करने का काम ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में सफलतापूर्वक शुरू हो चुका था। जब शाही सेना दमन के लिए आगे आयी, तब तक जनमुक्ति सेना देहातों में अपना आधार मज़बूत बना चुकी थी। इसके बाद 2005 में पार्टी ने रणनीतिक सन्तुलन से रणनीतिक आक्रमण की मंज़िल में प्रवेश की घोषणा तो कर दी, लेकिन गाँवों से शहरों को घेरकर और शहरों में जन-विद्रोह संगठित करके राज्यसत्ता पर क़ब्ज़ा करने की स्थिति सम्भव नहीं हो सकी। कारण कि नेपाल की राज्यसत्ता अर्ध्दऔपनिवेशिक चीन की तरह कमज़ोर और विश्रृंखलित नहीं थी। साथ ही, 1930 और 1940 के दशकों की विश्व परिस्थितियों से भिन्न, नेपाली शासक वर्ग को साम्राज्यवादियों और विश्व पूँजीवाद से अधिक व्यवस्थित ढंग से मदद मिल रही थी। शहरों में उसका आधार अधिक मज़बूत था। साथ ही, क्रान्तिकारी संघर्ष के आगे बढ़ने के बावजूद, आशा के विपरीत, शाही नेपाल सेना में विद्रोह की स्थिति नहीं बन सकी। यह सही है कि जनयुद्ध ने ही एक देशव्यापी क्रान्तिकारी उभार की स्थिति पैदा की थी, जिसके चलते संसदीय बुर्जुआ पार्टियों को भी अप्रैल 2006 में देशव्यापी जनान्दोलन में शामिल होने और माओवादियों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए बाध्‍य होना पड़ा। लेकिन यह भी सही है कि तब की स्थिति में जनयुद्ध की निर्णायक विजय के ज़रिये राज्यसत्ता पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं था। स्थिति यह थी कि न तो क्रान्ति की विजय सम्भव थी और न ही शासक वर्ग उसे कुचल सकता था। ऐसे समय में सरकार और माओवादियों के बीच शान्ति वार्ता के लिए ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने जो प्रयास किये, वे सर्वथा समयानुकूल थे।

आज पश्चदृष्टि से देखने पर कहा जा सकता है कि जनयुद्ध के रणनीतिक सन्तुलन की मंज़िल से रणनीतिक आक्रमण की मंज़िल में प्रवेश का ने.क.पा. (माओवादी) का 2005 का आकलन अपरिपक्व एवं समय-पूर्व था। नेपाली क्रान्ति को अगली मंज़िल में जाने के लिए नये सिरे से शक्ति जुटानी थी तथा अनुकूल समय की प्रतीक्षा के लिए कुछ विराम लेना था। सच्चाई यह है कि नेपाल की नवजनवादी क्रान्ति आज भी रणनीतिक सन्तुलन की ही मंज़िल में है। रणनीतिक आक्रमण की मंज़िल अभी दूर है। न केवल राजा से शान्ति वार्ता के बाद कोइराला के नेतृत्व में बनी सर्वदलीय अन्तरिम सरकार, बल्कि संविधान सभा के चुनाव के बाद प्रचण्ड के नेतृत्व में बनी बहुदलीय सरकार भी वस्तुत: एक आरजी (प्रॉविज़नल) सरकार ही है। मौजूदा संविधान सभा में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी लगातार संघर्ष करके और संविधान सभा के बाहर से जन संघर्षों का दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा जनपक्षधर बुर्जुआ जनवादी संविधान बनाने की कोशिश भर ही कर सकते हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियों के वर्ग-विश्लेषण में विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति यह सपने में भी नहीं सोच सकता कि मौजूदा संविधान सभा कोई ऐसा संविधान बना सकती है, जिसके अन्तर्गत एक लोक जनवादी गणराज्य क़ायम हो सकता है। ऐसा सोचना प्रकारान्तर से शान्तिपूर्ण संक्रमण की संशोधनवादी थीसिस को मानना होगा।

हमारी स्पष्ट धरणा है कि वर्तमान संविधान सभा जो नया संविधान बनायेगी, उसके द्वारा भी बुर्जुआ जनवादी गणराज्य ही स्थापित होगा। नये संविधान के अन्तर्गत बनने वाली सरकार यदि एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) की होगी, तब भी वह एक ‘प्रॉविज़नल’ सरकार ही होगी। ऐसी सरकार जैसे ही साम्राज्यवादी विश्व से निर्णायक विच्छेद और क्रान्तिकारी भूमि सुधर के लिए क़दम उठायेगी, वैसे ही सभी बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियाँ लामबन्द होकर उसके विरुद्ध संघर्ष छेड़ देंगी और बुर्जुआ वर्ग और भूस्वामी वर्ग निश्चय ही सशस्त्र प्रतिक्रान्ति की कोशिश करेंगे। तब नेपाली क्रान्ति को निश्चय ही सशस्त्र संघर्ष की नयी मंज़िल में प्रवेश करना होगा। उस नयी मंज़िल में, ज्यादा सम्भावना यही है कि क्रान्ति-मार्ग के संश्लेषण में, दीर्घकालिक लोकयुद्ध का पहलू गौण होगा और आम बग़ावत (जनरल इन्सरेक्शन) का पहलू प्रधन होगा। वर्तमान संक्रमण काल तथा संविधान सभा और ‘प्रॉविज़नल’ सरकार के वर्तमान कार्यकाल के बारे में यदि किसी प्रकार का संशोधनवादी विभ्रम न हो, तो इस अवधि का इस्तेमाल कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी बुर्जुआ जनवाद के वास्तविक चरित्र को नंगा करने और भावी निर्णायक संघर्ष के लिए जनसमुदाय को तैयार करने के लिए कर सकते हैं।

चिन्ता की बात यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) का अब तक का व्यवहार इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा है। सकारात्मक बात यह है कि ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) पहले से ही ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर के संशोधनवादी विचलनों के विरुद्ध संघर्ष करती रही है। हाल के दिनों में ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर भी इस प्रश्न पर दो लाइनों का संघर्ष उठ खड़ा हुआ। हम आशा करते हैं कि एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) संशोधनवादी भटकावों-विच्युतियों से छुटकारा पाकर आने वाले दिनों में नेपाली क्रान्ति को आगे बढ़ाने में सफल होगी।

(अगली पोस्‍ट में जारी)

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नेपाली क्रान्ति : नये दौर की समस्याएँ और चुनौतियाँ, सम्भावनाएँ और दिशाएँ-2

Posted by FNR on August 10, 2009

(पिछली पोस्‍ट से आगे)

नेपाल में समाज-विकास की दिशा और संक्रमण-अवधि की चुनौतियाँ : क्रान्तिकारी रणनीतिक लक्ष्य के लिए सही रणकौशल का सवाल निश्चय ही, राजतन्त्र की समाप्ति और संघात्मक जनवादी गणराज्य की घोषणा के साथ माओवादियों के नेतृत्व में नयी अन्तरिम सरकार का गठन नेपाल में जारी जनवादी क्रान्ति का एक महत्तवपूर्ण अगला मुक़ाम है। यह उपलब्धि महत्तवपूर्ण है, लेकिन इसे गुणात्मक रूप से भिन्न, क्रान्ति की अगली मंज़िल या अवस्था घोषित करना भ्रामक होगा और बेहद नुक़सानदेह भी।

राजशाही के ख़ात्मे के बावजूद राज्यतन्त्र के ढाँचे और वर्गचरित्र में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है। क्रान्तिकारी भूमि सुधर का काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है। भूस्वामी वर्ग के हितों की नुमाइन्दगी इस समय नेपाली कांग्रेस और अन्य बुर्जुआ दल कर रहे हैं। साथ ही, आज की विश्व परिस्थितियों और नेपाल की ठोस परिस्थितियों में नेपाली पूँजीपति वर्ग को भी दलाल और राष्ट्रीय के परस्पर-विरोधी प्रवर्गों में नहीं बाँटा जा सकता (जैसा कि नेपाल के सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी दल कर रहे हैं)। नेपाल का बड़ा पूँजीपति वर्ग और बड़ा व्यापारी वर्ग अपने चरित्र से अत्यधिक प्रतिक्रियावादी और साम्राज्यवाद-परस्त है, जबकि छोटा पूँजीपति वर्ग साम्राज्यवाद से सीमित आज़ादी की आकांक्षा रखता है और देश में पूँजीवादी विकास का भी पक्षधर है। लेकिन राजशाही की समाप्ति और सबसे बड़ी ताक़त के रूप में माओवादियों के सामने आने के बाद, यह वर्ग भी सर्वहारा क्रान्ति से अत्यधिक भयभीत होकर प्रतिक्रान्ति के पाले में जा खड़ा हुआ है। ने.क.पा. (एमाले) जैसी संशोधनवादी पार्टियाँ और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ मध्‍य वर्ग के साथ ही इन छोटे पूँजीपतियों की भी नुमाइन्दगी कर रही हैं जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के ख़िलाफ़ निर्णायक लामबन्दी में, आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, बड़े पूँजीपतियों और भूस्वामियों की नुमाइन्दगी करने वाली नेपाली कांग्रेस, सद्भावना पार्टी आदि के साथ खड़ी होंगी। जहाँ तक भूस्वामियों का प्रश्न है, नेपाली कांग्रेस और तराई की मधेस पार्टियाँ पुराने भूस्वामियों के साथ ही उन नये बुर्जुआ भूस्वामियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं जो सीमित स्तर पर पूँजीवादी भूमि सम्बन्धों के विकास के साथ नेपाल में पैदा हो चुके हैं। इस सन्दर्भ में इन पार्टियों का (सीमित हद तक बिस्मार्क, या ज़ारशाही और उसके मन्त्री स्तॉलिपिन जैसा) दोहरा चरित्र है। यदि सर्वहारा शक्तियों की पराजय की स्थिति में नेपाल में बुर्जुआ जनवादी गणराज्य की स्थिति भी क़ायम होगी, तो वहाँ के भूमि सम्बन्धों में ऊपर से, क्रमिक रूपान्तरण के ज़रिये, (”प्रशियाई मार्ग” से) परिवर्तन होना लाज़िमी होगा। नेपाल में सामन्ती भूस्वामियों के हितों को नुक़सान पहुँचाये बग़ैर उन्हें ही पूँजीवादी भूस्वामी बना देने, एक राष्ट्रीय बाज़ार का विकास करने, और इसके लिए साम्राज्यवाद की मातहती स्वीकार करते हुए भी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पध्र्दा का लाभ उठाने की नेपाल का बड़ा पूँजीपति वर्ग कोशिश करेगा और छोटे पूँजीपति वर्ग की, आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, इस आम नीति एवं रणनीति पर उसके साथ सहमति होगी। यानी, नेपाली कांग्रेस से लेकर ने.क.पा. (एमाले), ने.क.पा. (मा.ले.) जैसी संशोधनवादी पार्टियों तथा क्षेत्रीय और छोटी बुर्जुआ पार्टियों तक की, पूँजीवादी रास्ते के प्रश्न पर कमोबेश आम सहमति होगी और उनकी हर चन्द कोशिश होगी कि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी या तो पतित होकर पूँजीवादी संसदीय जनवाद के इस खेल में शामिल हो जायें, या फिर, संक्रमण अवधि का इस्तेमाल अपनी तैयारी के लिए तथा तरह-तरह से कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों का आधार कमज़ोर करने के लिए किया जाये और फिर प्रतिक्रान्ति के द्वारा क्रान्ति को निर्णायक रूप से कुचल दिया जाये।

कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के लिए भी इस संक्रमण-अवधि का एकमात्र सही इस्तेमाल यही हो सकता है कि वे निर्णायक संघर्ष की अगली मंज़िल के लिए तैयारी करें, जनयुद्ध के दौरान हासिल ताक़त को हरचन्द कोशिश करके बचायें और उसका विस्तार करें, बुर्जुआ एवं संशोधनवादी दलों के अन्तरविरोधों का लाभ उठायें, उनके जनाधर को संकुचित करें, तथा बुर्जुआ जनवादी व्यवस्था की सीमाओं और प्रतिगामी चरित्र का भण्डाफोड़ करें। ऐसा करने के बजाय यदि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच ऐसी कोई सोच अंशत: भी अपनी जगह बनाती है कि वर्तमान शान्ति प्रक्रिया एक दीर्घकालिक या स्थायी प्रक्रिया है और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी नया संविधान तैयार करके जनता का जनवादी गणराज्य स्थापित कर लेंगे (और जो कमी रह जायेगी, उसे नये संविधान के तहत होने वाले चुनाव में बहुमत हासिल करके संविधान संशोधन करके पूरी कर लेंगे), तो यह एक भीषण आत्मघाती विभ्रम होगा। बात तब और चिन्तनीय हो जाती है, जब हम पाते हैं कि मार्क्‍सवाद में सैद्धान्तिक इज़ाफ़ा करने के नाम पर बहुदलीय प्रतिस्पर्द्धात्‍मक जनवादी प्रणाली को सर्वहारा राज्यसत्ता का घटक बनाने की एक प्रबल लाइन ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर पहले से ही मौजूद रही है। इस लाइन के विरुद्ध ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) ने संघर्ष किया था और वर्ष 2008 के अन्तिम तीन-चार महीनों के दौरान ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर भी इस दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव के विरुद्ध तीखा संघर्ष चला, जिसके कारण इस लाइन को पीछे हटना पड़ा। लेकिन यह दक्षिणपन्थी अवसरवादी लाइन, पीछे हटने के बावजूद, अभी भी एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के भीतर मौजूद है और विभिन्न रूपों में प्रकट होती रहती है। इसकी अभिव्यक्तियों की आगे हम सिलसिलेवार चर्चा करेंगे। नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन में एकता की जो प्रक्रिया फ़िलहाल जारी है, वह बेहद सकारात्मक बात है। लेकिन एक नकारात्मक बात यह है कि दक्षिणपन्थी अवसरवादी या सामाजिक जनवादी भटकाव अभी भी मुख्य ख़तरे के रूप में मौजूद है। इस भटकाव का जड़मूल से ख़ात्मा ही नेपाली क्रान्ति की सफलता की सर्वोपरि बुनियादी गारण्टी है।

(अगली पोस्‍ट में जारी)

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नेपाली क्रान्ति किस ओर? नयी परिस्थितियाँ और पुराने सवाल

Posted by FNR on June 19, 2009

पिछली पोस्‍टों में हम नेपाल की क्रांति और नेपाल के माओवादी आन्‍दोलन का इतिहास और विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करते रहे हैं, जो आगे भी जारी रहेगा। इस बार हम नेपाल के ताजा घटनाक्रम और माओवादी पार्टी अंतरविरोधों पर प्रकाश डालता आलोक रंजन का लेख प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

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नेपाल विगत एक माह से भी अधिक समय से अनिश्चय और उथल-पुथल के भँवर से गुज़र रहा है। प्रधानमन्त्री पद से एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) के अधयक्ष पुष्प कमल दहाल ‘प्रचण्ड’ के इस्तीफे (4 मई ‘09) के बाद से ही देशव्यापी बन्द, हड़तालों और प्रदर्शनों के चलते शासन और प्रशासन की मशीनरी लगभग ठप्प है।

संकट की शुरुआत तब हुई जब जनता द्वारा चुनी गयी नागरिक सरकार की निरन्तर और जानबूझकर अवमानना के आरोप में प्रधानमन्त्री प्रचण्ड ने सेनाधयक्ष कटवाल को बर्खास्त कर दिया। कटवाल ने प्रधानमन्त्री के इस निर्देश को मानने से इनकार कर दिया। राष्ट्रपति रामबरन यादव ने भी प्रचण्ड के निर्देश को ठुकराते हुए और अन्तरिम संविधान की अवहेलना करते हुए कटवाल से पद पर बने रहने को कहा। फिर इस प्रश्न पर सरकार के दो सहयोगी दलों ने.क.पा. (ए.मा.ले.) मधोसी जनाधिकार मंच ने भी माओवादियों का साथ छोड़ दिया। नतीजतन सरकार अल्पमत में आ गयी और प्रचण्ड को इस्तीफा देना पड़ा। गत 23 मई को 24 में से 21 पार्टियों के समर्थन से माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व में नयी सरकार सत्तारूढ़ हुई जिसमें ने.क.पा (ए.मा.ले.) और नेपाली कांग्रेस मुख्य भागीदार हैं। नयी सरकार को समर्थन के मसले पर मधोसी जनाधिकार मंच दोफाड़ हो चुका है। विजय कुमार गच्छेदार गुट सरकार में शामिल है और गच्छेदार एक उपप्रधानमन्त्री हैं जबकि उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाला गुट विपक्ष में है।

एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) का कहना है कि सेना पर नागरिक सरकार का नियन्त्रण हर हाल में निर्णायक तौर पर क्फ़ायम होना चाहिए और राष्ट्रपति को सेनाधयक्ष कटवाल की बहाली सम्बन्‍धी अपना असंवैधानिक निर्देश वापस लेना चाहिए। उसका यह भी स्पष्ट आरोप है कि एक बड़ा पड़ोसी देश (स्पष्ट इशारा भारत की ओर है) अपने निहित स्वार्थों और विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं के चलते नेपाल के अन्दरूनी मामलों में दख़लन्दाज़ी कर रहा है और कटवाल-प्रकरण के पीछे भी उसकी अहम भूमिका है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रचण्ड के नेतृत्व वाली सरकार भारत के साथ तमाम असमानतापूर्ण सन्धियों की समीक्षा और समानता के आधार पर नये सम्बन्‍ध की माँग करती रही है और भारत पर पारम्परिक निर्भरता को छोड़कर चीन के साथ भी सहकार-सम्बन्‍ध की इच्छा ज़ाहिर करती रही है। साथ ही, भारत सरकार को यह भय भी सताता रहा है कि नेपाल में माओवादियों की सरकार रहते भारत में भी माओवादियों के सशस्त्र संघर्ष को विशेष बढ़ावा मिलेगा।

लेकिन मुख्य बात यह है कि नेपाल के साथ विगत आधी सदी से भी अधिक समय से जारी असमानतापूर्ण सम्बन्‍धों को भारतीय शासक वर्ग हर कीमत पर बनाये रखना चाहता है। सभी छोटे पड़ोसी देशों के प्रति भारतीय शासक वर्ग का विस्तारवादी और ”बड़े भाई” जैसा व्यवहार हमेशा से जगज़ाहिर रहा है और चीन के साथ उसकी प्रतिस्पर्द्धा भी कोई छुपी बात नहीं है। ऐसी स्थिति में नेपाल की नयी सरकार द्वारा समानतापूर्ण सम्बन्‍धों और सभी पड़ोसियों से (यानी चीन से भी) समान रूप से बेहतर सम्बन्‍धों की बात करना भारतीय शासक वर्ग भला कैसे पसन्द कर सकता था? काठमाण्डू स्थित भारतीय दूतावास लगातार वहाँ के अन्दरूनी मामलों में दख़ल देता रहा है। अपनी इसी स्थिति को बनाये रखने के लिए भारत सरकार ने लोकयु) और जनान्दोलन के दौरान लगातार राजशाही की भरपूर मदद की। नेपाल के क्रान्तिकारी संघर्ष को कुचलने में उसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के विश्वस्त सहयोगी की भूमिका निभायी। लेकिन राजशाही का पतन सुनिश्चित होने और संविधान सभा के चुनाव में ने.क.पा. (माओवादी) के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद भारतीय शासक वर्ग ने नेपाली कांग्रेस और ने.क.पा. (ए.मा.ले.) पर दाँव लगाया और हरचन्द कोशिशें की कि ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में सरकार का गठन न हो सके। उसकी इस भूमिका के चलते नेपाली जनता के भीतर यह धारणा और अधिक मज़बूत हुई है कि भारत एक विस्तारवादी देश है जो हर हाल में सम्प्रभु, स्वतन्त्र, जनवादी नेपाली गणराज्य का विरोध करता रहेगा।

जहाँ तक नेपाल के भीतर वर्ग-शक्ति- सन्तुलन का सवाल है, तमाम आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, वहाँ की क्रान्ति-विरोधी बुर्जुआ और सामन्ती ताक्फ़तें निर्णायक मसलों पर माओवादियों के ख़िलाफ एकजुट हैं। सत्तालोलुपता के चलते बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियों के बीच जो अन्तरविरोध उठते रहे हैं, उनका लाभ एक हद तक ने.क.पा. (माओवादी) को भी मिलता रहा है। लेकिन जब भी कोई बुनियादी नीतिगत मामला सामने आता है तो माओवादी अपने को एकदम अलग-थलग पाते हैं।

संविधान सभा के चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद ने.क.पा. (माओवादी) को सत्ता सँभालने की वैध हक्फ़दार ताक्फ़त के रूप में नेपाल के भीतर और बाहर की प्रतिक्रियावादी ताक्फ़तों ने कभी भी स्वीकार नहीं किया। सरकार में शामिल होने के बाद भी ने.क.पा. (ए.मा.ले.) और मधोसी पार्टियों ने आंशिक बुनियादी बदलाव के हर सवाल पर ने.क.पा. (माओवादी) का विरोध किया। शान्ति समझौते और अन्तरिम संविधान की तमाम शर्तों को ताक्फ़ पर रख दिया गया। सेना के एकीकरण की तय शर्तों को ठुकराकर नयी-नयी शतर्ें लगायी जाती रहीं। तनाव बढ़ता रहा और फिर इसी की तार्किक परिणति प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के रूप में सामने आयी।

नेपाल के घटनाओं ने एक बार फिर इस इतिहाससि) धारणा को ही पुख्ता किया है कि संसदीय चुनावों में बहुमत पाने के बावजूद मेहनतकश जनसमुदाय राज्य मशीनरी का अपने हितों के अनुरूप पुनर्गठन नहीं कर सकता। वह शासक वर्ग की राज्य मशीनरी का धवंस करके ही नयी राज्य मशीनरी की स्थापना कर सकता है। बेशक बुर्जुआ संसदीय चुनावों और संसद का (और यहाँ तक कि अन्तरिम या आरज़ी सरकारों का भी) रणकौशलगत (टैक्टिकल) इस्तेमाल किया जा सकता है, पर इनके द्वारा व्यवस्था परिवर्तन, या एक वर्ग से दूसरे वर्ग के हाथों सत्ता-हस्तान्तरण, नामुमकिन है। बुर्जुआ सत्ता का धवंस ही एकमात्र ऐतिहासिक विकल्प है।

ने.क.पा. (माओवादी) की समस्या यह रही है कि वह अपनी तमाम ”नयी स्थापनाओं” और गोलमोल, अस्पष्ट, द्विअर्थी वक्तव्यों से राज्य और क्रान्ति के प्रश्न पर स्वयं ही विभ्रम पैदा करती रही है और ढुलमुलपन का परिचय देती रही है। रणनीति (स्ट्रैटेजी) और बुनियादी विचारधारात्मक प्रश्नों को भी प्राय: वह रणकौशल के रूप में या कूटनीति के रूप में प्रस्तुत करती रही है। सर्वहारा अधिनायकत्व के अन्तर्गत पेरिस कम्यून और सोवियतों जैसी किसी ग्रासरूट स्तर की सर्वहारा जनवादी प्रणाली के बजाय वह बहुदलीय संसदीय प्रणाली की बात करती रही है और जनता में इस विभ्रममूलक धारणा को पुख्ता बनाती रही है कि मौजूदा संविधान सभा के ज़रिये और इसके द्वारा निर्मित संविधान के अन्तर्गत होने वाले चुनाव में जीतकर वह नेपाल में लोक जनवादी गणराज्य और फिर समाजवादी गणराज्य की स्थापना कर सकती है। ने.क.पा. (माओवादी) हालाँकि बीच-बीच में ‘नरो वा कुंजरो’ की भाषा में जनसंघर्ष की बात भी करती रहती है, पर उसकी कुल बातों का मुख्य ज़ोर संसदीय रास्ते पर ही पड़ता है। चुनाव जीतकर सत्तासीन होने और क्रान्तिकारी अर्थों में सत्ता कब्ज़ा करने के बीच के फक्र्फ़ को ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व ने स्वयं ही अपनी कथनी और करनी से जनता की नज़रों में काफी धूमिल कर दिया है। इस तरह उसने जनता और पार्टी कतारों की वर्ग संघर्ष की तैयारी की प्रक्रिया को स्वयं ही कमज़ोर कर दिया है।

प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के बाद नेपाली क्रान्ति के नेतृत्व के सामने एक कठिन चुनौतीपूर्ण लेकिन साथ ही सुनहरा अवसर आया था कि वह बुर्जुआ संसदीय विभ्रमों को तार-तार करते हुए जनता के बीच यह सन्देश लेकर जाये कि केवल जनसंघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। एक बार फिर सुदूरवर्ती ग्रामीण अंचलों में आधार इलाकों को मजबूत बनाने और शहरी क्षेत्रों में हड़तालों- प्रदर्शनों-जनान्दोलनों के सिलसिले को मजबूत बनाने का अवसर था। शान्ति समझौते और अन्तरिम संविधान के विपक्षी दलों द्वारा कई मामलों में उल्लंघन के बाद संघर्ष के रास्ते को न्यायोचित ठहराने का तर्क भी था। होना यह चाहिए था कि प्रचण्ड सरकार के इस्तीफे के बाद सभी माओवादी सांसदों को भी इस्तीफा देकर सड़क के संघर्ष में उतर पड़ना चाहिए था। पर ऐसा नहीं हुआ। इसका मूल कारण यह है कि पार्टी भी अब शायद इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं है और जनता को भी उसने इसके लिए तैयार नहीं किया है। सेना एकीकरण की शर्त को मानने के बाद (इस पर ‘बिगुल’ में हम अपनी शंका रख चुके हैं) जन सेना का बड़ा हिस्सा कैण्टोनमेण्ट में निश्शस्त्र बैठा है। बाहर युवा कम्युनिस्ट लीग और स्वयंसेवक दस्तों की ताक्फ़त है, पर वह सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं है। पुराने आधार इलाकों की समानान्तर लोकसत्ता मज़बूत होने के बजाय विगत दो वर्षों के दौरान कमज़ोर हुई है। पार्टी नेतृत्व अपना धयान समानान्तर लोकसत्ता को मज़बूत बनाने और बुर्जुआ संसदीय प्रणाली के ‘एक्सपोज़र’ के बजाय, सरकार चलाने पर और विभिन्न ”लोक कल्याणकारी” कार्यों पर केन्द्रित किये रहा है। पार्टी नेतृत्व का एक हिस्सा यह कहता रहा है कि मौजूदा संविधान सभा एक लोक जनवादी संविधान का निर्माण नहीं कर सकती, इसलिए हमारी कोशिश एक ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुख संविधान बनाने की ही हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि जब अधिकांश बुनियादी मसलों पर सभी बुर्जुआ और संशोधनवादी एकजुट हो जाते हैं, तो सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद ने.क.पा. (माओवादी) भला अंशत: जनोन्मुख संविधान स्वीकृत करवा पाने में भी सफल कैसे हो सकती है! यह तर्क दिया जा सकता है कि संविधान में बुर्जुआ जनवादी प्रावधानों का दायरा विस्तारित होने की स्थिति जनसंघर्ष के लिए अनुकूल होगी। लेकिन यह तर्क एक वैधिक विभ्रम है। नेपाल का शासक वर्ग आज जिस संकट से गुज़र रहा है, उसमें वह बुर्जुआ जनवाद के दायरे को वास्तव में विस्तारित नहीं होने देगा और यदि संविधान में ऐसे प्रावधान हों भी तो व्यवहार में इनका कोई मतलब नहीं रह जायेगा। दूसरी बात यह कि नेपाल में वर्ग संघर्ष जिस मंज़िल पर पहुँच चुका है, उस मुक्फ़ाम पर यह प्रश्न काफी हद तक अप्रासंगिक है कि वहाँ बुर्जुआ जनवाद का दायरा कितना विस्तारित या संकुचित होगा। आज यदि नेपाल में बुर्जुआ जनवाद के दायरे को फैलाने के संघर्ष पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता है तो यह भी एक सामाजिक जनवादी भटकाव होगा।

ताज़ा समाचारों के अनुसार, ने.क.पा. (माओवादी) और संशोधनवादी ने.क.पा. (ए.मा.ले.) के बीच समझौता वार्ता सफल होने के क्फ़रीब है। माओवादियों ने आश्वासन दिया है कि सेना पर नागरिक सरकार के नियन्त्रण की गारण्टी और कटवाल प्रकरण में राष्ट्रपति के असंवैधानिक निर्देश के निरस्त होने की स्थिति में वे जनान्दोलन स्थगित करने और संसद में विपक्ष के रूप में बैठकर माधव कुमार नेपाल की सरकार के साथ सहयोग करने तथा संविधान-निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। ज्यादा उम्मीद यही है कि जल्दी ही कोई समझौता- फार्मूला निकल आयेगा। यानी ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में चलने वाले जनान्दोलन का लक्ष्य क्रान्तिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि सापेक्षत: अधिक अनुकूल समझौते के लिए दबाव बनाना मात्र था! ऐसे में यह आशंका उठनी स्वाभाविक है कि क्या ने.क.पा. (माओवादी) विचारधारात्मक विभ्रमों, ढुलमुलपन और संसदीय भटकाव के भँवर में उलझकर वर्ग संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ने की उर्जस्विता और शक्ति खो चुकी है? क्या वह निर्णायक तौर पर संसदीय पक्ष-विपक्ष के खेल में शामिल हो चुकी है? इन प्रश्नों के उत्तार अभी भविष्य के गर्भ में हैं।

लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व में फिलहाल दक्षिणपन्थी अवसरवाद का पर्याप्त प्रभाव है, जो पार्टी को लगातार विपथगमन की दिशा में धकेल रहा है। इसका विरोध करने वाली जो धारा है, उसमें भी विचारधारात्मक सुस्पष्टता और सुसंगति की कमी है, जिसके चलते इस धारा से जुड़े लोग भी निर्णायक स्टैण्ड लेने और प्रतिकूल लहर के विरुद्ध डटकर खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। नेपाल की मेहनतकश जनता आज भी एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) को ही अपना नेता और हरावल मानती है। तमाम दक्षिणपन्थी भटकावों की निरन्तरता के बावजूद, इस पार्टी को अभी संशोधनवादी कतई नहीं कहा जा सकता। बुनियादी मुद्दों पर स्पष्टता की कमी के बावजूद पार्टी में दो लाइनों का संघर्ष अभी भी कई स्तरों पर जारी है और क्फ़तारों का क्रान्तिकारी जुझारूपन अभी भी क्फ़ायम है।

इस स्थिति में विश्व सर्वहारा क्रान्ति और नेपाली क्रान्ति के हर समर्थक- शुभचिन्तक की, स्वाभाविक तौर पर यही कामना है कि एकीकृत ने.क.पा. (माओवादी) तमाम संसदीय विभ्रमों और दक्षिणपन्थी विचलनों से मुक्त होकर नेपाल की मेहनतकश जनता के सच्चे क्रान्तिकारी नेता और हरावल दस्ते की भूमिका निभाये। हम नेपाल की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी क्फ़तारों का आह्नवान करते हैं कि वे संशोधनवादी भटकाव की हर किस्म को जड़मूल से नष्ट कर दें क्योंकि यही सर्वहारा क्रान्ति की प्रथम और सर्वोपरि गारण्टी है।

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नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-14

Posted by FNR on June 8, 2009

(पिछली पोस्‍ट से आगे) इस लेख की अंतिम किस्‍त

नेपाली क्रान्ति का लम्बा रास्ता : भविष्य के गर्भ में छिपी सम्भावनाएँ

240 साल पुराने राजतन्त्र की समाप्ति और पूँजीवादी बहुदलीय संसदीय लोकतन्त्र की बहाली नेपाली नवजनवादी क्रान्ति की एक महत्तवपूर्ण विजय है, एक ऐतिहासिक मुकाम है और एक अहम मोड़बिन्दु है। यह आंशिक-अधूरी जनवादी क्रान्ति है। क्रान्ति की प्रक्रिया अभी जारी है और यह अवधि अभी लम्बी होगी। संक्रमण की यह अवधि अनेक मोड़ों-घुमावों से भरी होगी, जिनका पहले से पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।

ज़ाहिर है कि पूँजीवादी संसदीय पार्टियाँ त्रिशंकु संविधान सभा का लाभ उठाकर सत्ता की बन्दरबाँट और जोड़तोड़ का घिनौना खेल खेलेंगी और भावी संविधान को पूँजीवादी परिधि के भीतर सीमित रखने की हरचन्द कोशिश करेंगी। बहुमत न हो पाने की स्थिति में क्रान्तिकारी वाम धारा की पार्टियाँ यदि सरकार बना भी लेती हैं तो राष्ट्रीय स्वतन्त्रता-सम्प्रभुता की बहाली, असमान सन्धियों को रद्द करना और राज्य के ढाँचे के पुनर्गठन के काम को अंजाम दे पाना उनके लिए कठिन होगा। ऐसी स्थिति में सरकार से बाहर आकर फिर से जनयुद्ध की राह पकड़ना ही एकमात्र क्रान्तिकारी विकल्प होगा। और तब जनता पूरी ताकत के साथ इस विकल्प के साथ होगी, क्योंकि बुर्जुआ संसदीय पार्टियों और संशोधनवादियों का चरित्र उनके सामने पूरी तरह नंगा हो चुका रहेगा।

अस्थिरता का दौर लम्बा खिंचने पर बुर्जुआ वर्ग द्वारा सैन्य प्रतिक्रान्ति की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में भी प्रतिक्रियावादियों को देशव्यापी जनउभार का सामना करना पड़ेगा, जनयुद्ध को नया संवेग प्राप्त हो जायेगा और नेपाली क्रान्ति नयी मंज़िल में प्रविष्ट हो जायेगी।

ऐसा भी हो सकता है कि जनता को कुछ अधिक जनवादी अधिकार देने वाला संविधान और एक पूँजीवादी गणतन्त्र अस्तित्व में आये और नये संविधान के अन्तर्गत फिर से चुनाव हों। यदि क्रान्तिकारी वाम की शक्तियाँ एकजुट हों तो उस चुनाव में भी वे बहुमत हासिल कर सकती हैं। साथ ही, संसद से बाहर जनसंघर्ष और वैकल्पिक क्रान्तिकारी सत्ता के विकास की प्रक्रिया जारी रहे, तो क्रान्तिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाकर क्रान्ति एक नवजनवादी गणराज्य स्थापित करने का और समाजवादी संक्रमण के दौर में प्रविष्ट होने का लक्ष्य हासिल कर सकती है।

यदि किन्हीं परिस्थितयों में बुर्जुआ और संशोधनवादी पार्टियों का कोई गँठजोड़ इस दीर्घ संक्रमण अवधि के दौरान सत्तारूढ़ होने में सफल होता है (जिसकी सम्भावना कम है), तो वर्तमान विश्व परिस्थितियों में वह भी साम्राज्यवाद के सहयोग से देश में ऊपर से पूँजीवादी विकास और ‘प्रशियाई मार्ग’ से पूँजीवादी भूमि सुधर को ही अन्ततोगत्वा लागू करने की कोशिश करेगा। ऐसी स्थिति में वर्ग सम्बन्ध बदलने लगेंगे और नेपाल की क्रान्ति जनवादी क्रान्ति से आगे बढ़कर समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में प्रविष्ट हो जायेगी। क्रान्ति की मंज़िल बदल सकती है, लेकिन प्रतिकूलतम स्थितियों में भी नेपाली क्रान्ति की विकास-प्रक्रिया अब पीछे नहीं लौट सकती है। वह कुछ समय को रुक सकती है, लेकिन अन्तत: उसे आगे ही जाना है।

नेपाल में वर्ग संघर्ष जारी है। उसका एक मंच संविधान सभा है और दूसरा मंच संसद-सरकार के बाहर है। अन्तिम निर्णय दूसरे मंच पर ही होना है।

ऐसी स्थिति में, जैसा कि हमने ऊपर भी उल्लेख किया है, काफ़ी कुछ दारोमदार इस बात पर है कि सर्वहारा वर्ग की हरावल शक्तियों की एकता की प्रक्रिया कितनी तेज़ गति से आगे बढ़ती है। दूसरा महत्तवपूर्ण निर्णायक उपादान यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) के सर्वहारा जनवाद विषयक ”मुक्त चिन्तन” और बहुदलीय जनतन्त्र विषयक धरणा में दक्षिणपन्थी भटकाव के जो ख़तरे मौजूद हैं, उनसे वह कितनी जल्दी छुटकारा पा लेती है और छुटकारा पाती भी है या नहीं।

नेपाल में जारी क्रान्ति बीसवीं सदी का छूटा हुआ कार्यभार है, जो इक्कीसवीं सदी में पूरा हो रहा है। भारत जैसे तीसरी दुनिया के अग्रणी देशों में नेपाल से परिस्थितियाँ काफ़ी भिन्न हैं, लेकिन फिर भी दुनिया के एक देश में बीहड़ परिस्थितियों में जारी सर्वहारा क्रान्ति आज हर देश के सर्वहारा क्रान्तिकारियों के लिए एक महत्तवपूर्ण प्रेरणास्रोत का काम कर रही है। साथ ही, यदि भारत, बंगलादेश और ”बाज़ार समाजवादी” चीन जैसे देशों में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शक्तियों का पुनरुत्थान होगा, तो इससे नेपाली क्रान्ति को एक नया संवेग प्रदान होगा।

आज विश्व पूँजीवाद का गहराता संकट दुनिया के अलग-अलग कोनों में जिस प्रकार नये विस्फोटों की ज़मीन तैयार कर रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नेपाली क्रान्ति का मार्ग बीहड़ और मोड़ों-घुमावों से भरा ज़रूर होगा, लेकिन उसका भविष्य उज्ज्वल है।

(10 जून, 2008)

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नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-13

Posted by FNR on June 8, 2009

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चुनाव-परिणामों का विश्लेषण : कुछ और महत्तवपूर्ण पहलू

चुनाव-परिणामों का विश्लेषण : कुछ और महत्तवपूर्ण पहलू ऊपर हम इस बात की चर्चा कर आये हैं कि संविधान सभा के चुनाव के पूर्व यदि ने.क.पा. (एकता केन्द्र) और ने.क.पा. (माओवादी) के बीच एकता या कम से कम तालमेल भी हो जाता तो क्रान्तिकारी वाम सरकार बनाने लायक़ बहुमत आसानी से हासिल कर सकता था। यदि क्रान्तिकारी वाम शिविर के बीच तालमेल हो पाता तो दो-तिहाई बहुमत भी हासिल किया जा सकता था। ऐसा न हो पाने के लिए ने.क.पा. (माओवादी) की अहम्मन्यता व अतिआत्मविश्वास एक हद तक ज़िम्मेदार था। साथ ही, मोहन बिक्रम सिंह के नेतृत्व वाली ने.क.पा. (मसाल) व ने.म.कि.पा., ने.क.पा. (यूनिफ़ायड) जैसी छोटी क्रान्तिकारी वाम पार्टियों की संकीर्ण गुटवादी मानसिकता की भी महत्तवपूर्ण नकारात्मक भूमिका थी। लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं थी। चुनाव परिणामों का विश्लेषण व्यापक सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए। संविधान सभा का चुनाव पूँजीवादी संसदीय चुनाव-प्रणाली के फ्रष्ेमवर्क के अन्तर्गत हुआ। इस फ्रष्ेमवर्क में निर्वाचक मण्डल का निर्धारण जिस प्रकार होता है, चुनावों में पूँजी, जोड़तोड़-तिकड़म और पूँजीवादी प्रचार तन्त्र की जो भूमिका होती है, उसका ज्यादा से ज्यादा लाभ बुर्जुआ संसदीय पार्टियों को मिलता है। इस बात को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। रूस में 1917 की अक्टूबर क्रान्ति के समय सोवियतों में बोल्शेविकों के नेतृत्व वाले गठबन्धन का बहुमत था, लेकिन संविधान सभा में बोल्शेविक बहुमत नहीं हासिल कर पाये। महत्तवपूर्ण बात यह भी है कि दोहरी सत्ता की मौजूदगी के उस काल में भी अन्तिम निर्णय बलात सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के द्वारा ही हुआ। स्पष्ट है कि नेपाल में संविधान सभा के चुनावों में नेपाली कांग्रेस और ने.क.पा. (एमाले) द्वारा दूसरे और तीसरे क्रम पर अधिक सीटें हासिल कर पाने का एक अहम कारण पूँजीवादी जनवादी चुनाव प्रणाली भी रही है। ऐसी स्थिति में यदि सत्ता के बँटवारे का कोई फार्मूला निकल भी आता है और ने.क.पा. (माओवादी) एक अल्पमत सरकार बना पाने में सफल हो भी जाती है, तो सच्चे अर्थों में एक नवजनवादी संविधान का बन पाना सम्भव नहीं है। आगे चलकर, एक ज्यादा से ज्यादा जनोन्मुख पूँजीवादी जनवादी संविधान के अन्तर्गत भी यदि चुनाव पूँजीवादी संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत होंगे तो पूँजीवादी पार्टियों के उनसे लाभान्वित होने की स्थिति किसी न किसी हद तक बनी रहेगी। फिर इस सच्चाई की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नौकरशाही, सेना-पुलिस और न्यायपालिका का ढाँचा जब तक आमूल रूप से नहीं बदलेगा, तब तक संसद में क्रान्तिकारी वाम के बहुमत पा लेने और सरकार बना लेने मात्र से सर्वहारा राज्यसत्ता या नवजनवादी राज्यसत्ता के अस्तित्व में आ जाने की बात नहीं सोची जा सकती। आगे नये संविधान के अन्तर्गत होने वाले चुनाव में यदि क्रान्तिकारी वाम बहुमत पा भी लेता है तो प्रतिक्रान्ति की सम्भावनाएँ बनी रहेंगी। ऐसी स्थिति में सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि जनता की समान्तर क्रान्तिकारी वैकल्पिक सत्ता नेपाल में किस रूप में विकसित होगी और दोहरी सत्ता की स्थिति किस रूप में पैदा होगी। एक महत्तवपूर्ण सकारात्मक बात यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) अपनी सशस्त्र शक्ति को बनाये रखने और युवा कम्युनिस्ट लीग को बनाये रखने के सवाल पर दृढ़ है। वर्गों के बीच जारी संघर्ष में अन्तिम निर्णय तो बल-प्रयोग के द्वारा ही होना है!

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नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-10

Posted by FNR on April 17, 2009

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जनयुद्ध के दौरान माओवादी क़तारों के बीच सामाजिक फासीवादी और सैन्यवादी प्रवृत्तियाँ विकसित होने और उनके द्वारा बल-प्रयोग की अवरणा को ग़लत ढंग से लागू करने की (यानी कई मामलों में मित्र शक्तियों और जनता के ख़िलाफ़ भी बल प्रयोग करने की) ने.क.पा. (एकता केन्द्र) आलोचना करती रही। उसका कहना था कि इसकी विचारधारात्मक जड़ सर्वहारा जनवाद के प्रति माओवादियों के ग़लत दृष्टिकोण में निहित है। पार्टी-निर्माण की प्रक्रिया को लेकर भी ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने सवाल उठाया और यह आलोचना रखी कि पार्टी के भीतर वैचारिक-राजनीतिक शिक्षा पर ज़ोर न देने और कम्युनिस्ट मूल्यों का प्रचार नहीं करने के कारण माओवादी क़तारों में वीरता और जुझारूपन के बावजूद नैतिक पतन की घटनाएँ सामने आती रही हैं। कालान्तर में ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व ने भी इन आलोचनाओं को एक हद तक स्वीकार किया और क्रान्ति के भीतर क्रान्तिकी आवश्यकता पर बल देना शुरू किया। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) माओवादियों के राजनीतिक व्यवहार की विसंगतियों पर बल देते हुए यह मानती रही है कि उनके भीतर फ़िलहाल तीन प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं : संकीर्णतावादी जड़सूत्रवादी प्रवृत्ति, दक्षिणपन्थी प्रैग्मेटिज्मकी प्रवृत्ति और क्रान्तिकारी प्रवृत्ति। फ़िलहाल क्रान्तिकारी प्रवृत्ति प्रन है, लेकिन दक्षिणपन्थी भटकाव का भी पर्याप्त ख़तरा मौजूद है।

इन मतभेदों के बावजूद, संविधान सभा के चुनाव के एक वर्ष पहले तक लाइन और रणनीति के बुनियादी सवालों पर दोनों संगठनों के बीच बुनियादी एकता बनने लगी थी और स्थिति ऐसी बन चुकी थी कि अन्य मतभेदों पर एक पार्टी के भीतर संघर्ष चलाया जा सकता था। इस आकलन के आधार पर, क्रान्ति के दीर्घकालिक हित में एक वर्ष पहले ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने पार्टी एकता के लिए पहल की। ने.क.पा. (माओवादी) ने शुरू में तो इसे गम्भीरता से नहीं लिया, लेकिन फिर वार्ता आगे बढ़ी। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का आकलन था कि दोनों पार्टियों में एकता या कम से कम तालमेल की स्थिति में क्रान्तिकारी वाम के पक्ष में देशव्यापी लहर पैदा की जा सकती थी, अन्य छोटी क्रान्तिकारी वाम पार्टियों और ने.क.पा. (एमाले) को भी गठबन्धन में आने को विवश किया जा सकता था और क्रान्तिकारी वाम धारा दो तिहाई बहुमत भी हासिल कर सकती थी। आगे चलकर चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया कि यह आकलन काफ़ी हद तक सही था। चुनाव के ठीक पहले एकता के लिए नीतिगत सहमति पर प्रचण्ड और प्रकाश का संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ, चुनाव के लिए संयोजन समिति बनी और तालमेल का निर्णय हुआ। लेकिन ने.क.पा. (माओवादी) के संकीर्णतावादी रुख़ के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और चुनाव में क्रान्तिकारी वाम के मतों में बँटवारे के चलते भारी नुक़सान हुआ। ने.क.पा. (माओवादी) ने चुनाव में कुल 220 सीटें हासिल कीं, जबकि ने.क.पा. (एकता केन्द्र) के जनमोर्चा, नेपाल को 7 सीटें मिलीं। क्रान्तिकारी वाम धारा के अन्य दलों मोहन बिक्रम सिंह के राष्ट्रीय जनमोर्चा को 4, नेपाल मज़दूर किसान पार्टी को 4 और ने.क.पा. (एकीकृत) को 2 सीटें मिलीं। चूँकि जनता ने ने.क.पा. (माओवादी) को ही जीत की सम्भावना की दृष्टि से बेहतर विकल्प मानते हुए मत दिया, इसलिए सीटों की दृष्टि से ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की शक्ति और जनार का अनुमान लगाना ग़लत होगा। बहरहाल, क्रान्तिकारी वाम धारा के मतों के विभाजन के कारण ही त्रिशंकु संसद की स्थिति पैदा हुई, इतना तय है।

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नेपाल का कम्युनिस्ट आन्दोलन : एक संक्षिप्त इतिहास-9

Posted by FNR on March 24, 2009

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ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र) के बीच मतभेद के मुद्दे, राजनीतिक वाद-विवाद और क़दम-ब-क़दम एकता की ओर अग्रवर्ती विकास

पिछले लगभग दो दशकों के दौरान नेपाल के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर में बिखराव, एकता और ध्रुवीकरण की जो प्रक्रिया चलती रही है उसमें दो पार्टियाँ प्रमुख शक्तियों के रूप में उभरकर सामने आयीं पहली, ने.क.पा. (माओवादी) और दूसरी ने.क.पा. (एकता केन्द्र)। राजनीतिक विश्लेषक पिछले एक दशक के दौरान नेपाल में माओवादी जनयुद्ध की विकास-प्रक्रिया और उसकी उपलब्धियों-विशिष्टताओं पर काफ़ी कुछ लिखते रहे हैं, लेकिन इस दौरान ने.क.पा. (माओवादी) की अवस्थितियों में आये महत्तवपूर्ण और नाटकीय बदलाव पर बहुत कम ध्‍यान दिया गया है। जनयुद्ध की पूरी अवधि के दौरान माओवादियों की नीतियों में आये बहुतेरे बदलावों के पीछे क्रान्तिकारी वाम शिविर की इन दो प्रमुख धाराओं के बीच जारी बहसों का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है। इन बहसों को पश्चदृष्टि से देखने पर हम पाते हैं कि 1994 में ने.क.पा. (एकता केन्द्र) से अलग होने और 1996 में जनयुद्ध शुरू करने के समय से लेकर बाद के लगभग एक दशक के दौरान ने.क.पा. (माओवादी) ने क्रान्तिकारी व्यवहार के दौरान अपनी बहुत सारी पूर्ववर्ती अवस्थितियों को छोड़कर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थितियों को अपना लिया। 2007 तक स्थिति यह हो चुकी थी कि मतभेद के अधिकांश मुद्दे हल हो गये थे। ऊपर हम चर्चा कर आये हैं कि 1994 की फूट के समय ने.क.पा. (एकता केन्द्र) में मतभेद का पहला मुद्दा समाजवादी संक्रमण से जुड़े अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के अनुभवों के आकलन को लेकर था। इस प्रश्न पर आगे चलकर ने.क.पा. (माओवादी) ने मूलत: और मुख्यत: ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थिति को अपना लिया। मतभेद का दूसरा मुद्दा सर्वहारा जनवाद की समझदारी और उससे जुड़ी समस्याओं को लेकर था। इस प्रश्न पर भी आगे चलकर ने.क.पा. (माओवादी) ने.क.पा. (एकता केन्द्र) के निष्कर्षों पर आ गयी और इस मुद्दे पर दस्तावेज़ भी निकाला। लेकिन इस समस्या के उपचार को लेकर माओवादियों की जो सोच है, उसमें ने.क.पा. (एकता केन्द्र) दक्षिणपन्थी भटकाव का एक नया ख़तरा देख रही है। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का मानना है कि बहुदलीय लोकतन्त्र की भूमिका को ने.क.पा. (माओवादी) बहुत बढ़ा-चढ़ाकर देखती है और उसकी सीमाओं की अनदेखी कर रही है। बहुदलीय प्रतिस्पध्र्दा की बात तो मार्क्‍स और एंगेल्स ने भी की थी, लेकिन समाजवाद की रक्षा और निर्माण बहुदलीय जनवाद से नहीं बल्कि सोवियत जनवाद से ही हो सकता है। बहुदलीय संसदीय मंच उसका सहायक अंग ही हो सकता है। एकता केन्द्र को माओवादियों की सोच में मदन भण्डारी द्वारा प्रस्तुत बहुदलीय लोकतन्त्र की अवरणा की ओर झुकाव का ख़तरा दिखायी देता है। उसका मानना है कि सर्वहारा जनवाद या नवजनवाद को स्वीकार करने वाली पार्टियों के बीच प्रतिस्पध्र्दा हो सकती है, लेकिन समाजवादी संक्रमण के दौरान आने वाली जनवाद की समस्या का समान उससे नहीं हो सकता। समान केवल सोवियत मॉडल में है कठपुतली सोवियतें नहीं बल्कि प्रभावी सोवियतों में है। उल्लेखनीय है कि इस प्रश्न पर ने.क.पा. (माओवादी) पहले जड़सूत्रवादी अवस्थिति पर खड़ी थी जबकि अब उसकी अवस्थिति में दक्षिणपन्थी भटकाव का ख़तरा दिख रहा है।

मतभेद के तीसरे मुद्दे, यानी क्रान्ति के रास्ते के प्रश्न पर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने जब लोकयुद्ध के साथ आम बग़ावत के कुछ घटकों के भी संश्लेषण की बात कही थी तो ने.क.पा. (माओवादी) ने सारसंग्रहवादी कहकर उनकी आलोचना की थी लेकिन बाद में उन्होंने इसी रणा को अपना लिया और इसे प्रचण्ड पथका एक घटक बना लिया।

लेकिन प्रचण्ड पथके प्रश्न पर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का दृष्टिकोण अभी भी तीव्र आलोचनात्मक है। फ़र्क़ यह है कि ने.क.पा. (माओवादी) अब कम से कम उसकी आलोचना पर विचार करने के लिए तैयार है। सन 2000 में मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के साथ प्रचण्ड पथको भी नेपाली क्रान्ति का मार्गदर्शक सिद्धान्त घोषित करते हुए ने.क.पा. (माओवादी) ने एक बार फिर अपनी ही उस अवस्थिति को पलट दिया था, जिस पर खड़े होकर उसने कभी पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा गोंज़ालो विचारधाराको विचारधारात्मक मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाने का विरोध किया था। प्रचण्ड पथके सार्वभौमिक महत्तव की व्याख्या पार्टी के तीन नेता तीन अलग-अलग तरीक़ों से करते हैं। बाबूराम भट्टराई कहते हैं कि मुख्यत: नेपाली विशिष्टता के बावजूद इसका एक सार्वभौमिक चरित्र भी है। प्रचण्ड का कहना है कि विश्व क्रान्ति को दिशा देने के लिए प्रचण्ड पथको अभी लम्बा रास्ता तय करना होगा। इस प्रकार सार्वभौमिकता पर उनका ज़ोर भट्टराई से कुछ अधिक है। लेकिन सबसे आगे बढ़कर, केन्द्रीय कमेटी के तीसरे प्रमुख सदस्य किरण इसे इक्कीसवीं सदी की विश्व क्रान्ति की आधारशिलाही घोषित कर देते हैं। इससे अधिक हास्यास्पद बड़बोलापन कुछ और नहीं हो सकता। नेपाल में जारी राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति वस्तुत: इतिहास का एक छूटा हुआ कार्यभार है जो अब पूरा हो रहा है। यह बीसवीं सदी की क्रान्ति है जो इक्कीसवीं सदी में हो रही है। पिछड़ी उत्पादक शक्तियों वाले नेपाल में क्रान्ति के मार्ग का सामान्य अनुभव किसी भी रूप में पूँजीवादी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुके भारत, चीन, द. अफ्रीका, नाइजीरिया, मिस्र, इण्डोनेशिया, मलेशिया, ब्राज़ील, चीले, अर्जेण्टीना, मेक्सिकोआदि तीसरी दुनिया के उन अधिकांश देशों की क्रान्तियों का मार्गदर्शक नहीं हो सकता जहाँ आधारभूत-अवरचनागत उद्योगों और वित्तीय पूँजी की शक्ति का काफ़ी विकास हो चुका है, भूमि-सम्बन्धों में पूँजीवादी बदलाव के बाद वर्ग-संश्रय बदल चुका है और जहाँ सर्वहारा-अर्ध्दसर्वहारा आबादी की जनसंख्या आज आबादी के अन्य वर्गों की अपेक्षा सबसे अधिक हो चुकी है। स्पष्ट है कि बदली विश्व-परिस्थितियों के बारे में ने.क.पा. (माओवादी) की सोच निहायत सतही, यान्त्रिक और बचकानी रही है। प्रचण्ड पथकी अवरणा के बड़बोलेपन को समझने के लिए संक्षेप में यह भी जान लेना ज़रूरी है कि इसके कौन से संघटक अवयव गिनाये जाते हैं!

प्रचण्ड पथका एक संघटक अवयव यह बताया गया कि इसने दक्षिणपन्थी संशोधनवाद और कठमुल्लावादी संशोधनवाद ऌन दोनों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए क्रान्तिकारी मार्क्‍सवाद को आभ्यन्तरीकृत किया। लेकिन यह प्रचण्ड पथकी नयी विशिष्टता नहीं, मार्क्‍सवाद की पुरानी विशिष्टता है। मार्क्‍सवाद अपने जन्मकाल से ही इन दोनों प्रकार के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्र्ष करते हुए विकसित हुआ है।

प्रचण्ड पथका दूसरा संघटक अवयव यह बताया गया कि इसने स्तालिन द्वारा प्रस्तुत एकाश्मी पार्टी की धरणा को ख़ारिज करके दो लाइनों के संघर्ष और आन्तरिक संघर्ष की सजीव प्रक्रिया से लैस पार्टी की धरणा को स्थापित किया। यह भी एक निहायत हास्यास्पद बात है। दो लाइनों के संघर्ष की सजीव आवयविक व्यवस्था से लैस पार्टी की सोच पार्टी की लेनिनवादी अवधरणा का बुनियादी सूत्र है, जिससे स्तालिन काल में कुछ विचलन पैदा हुआ। पुन: माओ त्से-तुङ ने इस अवधरणा को न केवल स्थापित किया बल्कि सांस्कृतिक क्रान्ति के दौर तक आते-आते नयी ऊँचाइयों तक विकसित किया। प्रचण्ड का इसमें कोई भी मौलिक अवदान नहीं माना जा सकता। पार्टी गठन के सन्दर्भ में ने.क.पा. (माओवादी) का यह दावा है कि नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास के वस्तुपरक विश्लेषण के द्वारा उसने पार्टी एकता को नयी ऊँचाइयों तक विकसित किया और यह भी प्रचण्ड पथकी एक विशिष्टता है। इस दावे की सच्चाई क्या है? मोहन बिक्रम सिंह द्वारा पुष्पलाल को ग़द्दारघोषित करने से अलग हटकर ने.क.पा. (माओवादी) ने उनकी सकारात्मक भूमिका का सही मूल्याँकन रखा, लेकिन साथ ही उसने पुष्पलाल के दक्षिणपन्थी भटकावों की पूरी तरह से अनदेखी की। इस मायने में भी ने.क.पा. (एकता केन्द्र) द्वारा प्रस्तुत मूल्यांकन अधिक सन्तुलित है। जहाँ तक पार्टी एकता का प्रश्न है, ‘प्रचण्ड पथके सूत्रीकरण ने उसके रास्ते में कुछ नयी बाधएँ ही पैदा कीं।

ने.क.पा. (माओवादी) दक्षिण एशिया सोवियत संघ के अपने प्रस्ताव को भी एक सकारात्मक अवदान मानते हुए इसे प्रचण्ड पथका एक घटक तत्व बताया। इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह है कि आज इस प्रस्ताव की कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है और यह केवल एक मंसूबावादी विचार ही हो सकता है। ऐसा कोई संघ दक्षिण एशिया के देशों में सर्वहारा क्रान्ति के बाद ही बन सकता है और वह भी तब, जबकि उन सभी देशों की सर्वहारा सत्ताएँ उसे स्वीकार करें। दूसरी बात यह कि ऐसे किसी क्षेत्रीय संघ का गठन विश्व सर्वहारा क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास की अपरिहार्य शर्त या एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता। ऐसी सम्भावना हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। तीसरी बात यह कि क्रान्ति के पहले और क्रान्ति के बाद दुनियाभर की कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी भावना से एक दूसरे की मदद करना और किसी प्रकार के अन्तरराष्ट्रीय मंच का गठन करना एक बात है और दक्षिण एशिया सोवियत संघ जैसी किसी चीज़ का निर्माण सर्वथा अलग बात है। चौथी बात यह कि दक्षिण एशिया के बड़े, विकसित देशों में क्रान्तिकारी वाम की शक्तियाँ अभी क्रान्ति को नेतृत्व दे पाने की स्थिति से काफ़ी दूर हैं और आज ऐसे किसी संघ की बात सोचना ख्याली पुलाव से अधिक कुछ भी नहीं है। पाँचवी बात यह कि आज इस प्रकार की बातें करना बड़े देशों की पार्टियों के बड़े भाइयों जैसे रवैयेको और क्रान्ति के आयात-निर्यात की रणा को बढ़ावा देने का काम कर सकता है।

प्रचण्ड पथकी एक मुख्य विशेषता यह बतायी गयी कि इसने सशस्त्र विद्रोह की कतिपय रणनीतियों को दीर्घकालिक लोकयुद्ध के क्रान्ति-मार्ग के फ़्रेमवर्क में समाहित कर लिया। सच्चाई यह है कि ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने जब इस प्रकार के संश्लेषण की बात की थी तो माओवादी नेतृत्व ने सारसंग्रहवादी कहते हुए उनकी आलोचना की थी। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने 1996 के अपने पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में ही यह बात कही थी। साथ ही, ‘प्रचण्ड पथइस प्रकार के संश्लेषण को इक्कीसवीं सदी की सर्वहारा क्रान्तियों की एक सार्वभौमिक विशिष्टता बताता है जबकि ऐसा मानने का कोई भी तर्कसंगत आधार नहीं है।

रणनीतिक दृढ़ता और रणकौशलात्मक लचीलेपन को ने.क.पा. (माओवादी) प्रचण्ड पथकी एक और विशिष्टता बताती है। यह विशिष्टता लेनिन के ज़माने से ही सर्वहारा पार्टियों की परिपक्वता की निशानी मानी जाती रही है। यह कोई मौलिक खोज नहीं है। सच्चाई यह है कि रणकौशलात्मक लचीलेपनके नाम पर ने.क.पा. (माओवादी) अपनी नीतियों में अक्सर बेहद अस्थिरता का संकेत देती रही है और उसका नेतृत्व अक्सर निहायत ग़ैरज़िम्मेदाराना ढंग से विचारधारात्मक-रणनीतिक उसूली मसलों को भी रणकौशल और कूटनीति का मसला बना देता रहा है। यह प्रवृत्ति यदि बनी रही तो ख़तरनाक ढंग से दक्षिणपन्थी विपथगमन का सबब बन सकती है। 1999 में ने.क.पा. (माओवादी) ने वामपन्थियों, देशभक्तों और जनवादी ताक़तों की संयुक्त क्रान्तिकारी सरकार का रणकौशलात्मक नारा दिया। बाद में तत्कालीन संविधान को रद्द करने, संसद भंग करने, अन्तरिम सरकार के गठन और संविधान सभा का रणकौशलात्मक नारा आया। उसके बाद उन्होंने सर्व-पार्टी सम्मेलन, अन्तरिम सरकार और एक लोक संविधान की गारण्टीका नारा दिया। इसके बाद एक केन्द्रीय लोक सरकार का रणकौशलत्मक नारा दिया गया, जिसे ढाई वर्ष बाद पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन ने मुख्य रणनीतिक नारा बना दिया।

ने.क.पा. (माओवादी) रणकौशल ही नहीं, बल्कि विचारधारा और राजनीति के बुनियादी उसूली प्रश्नों पर भी गैरउसूली लचीला रुख़ अपनाती रही है। 2003 तक उनका आकलन था कि जनयुद्ध अब जल्दी ही रणनीतिक आक्रमण के दौर में प्रविष्ट हो जायेगा, फिर इस आकलन से पीछे हटते हुए उन्हें संविधान सभा के चुनाव और संघात्मक गणराज्य की स्थापना के रणकौशलात्मक नारे तक आना पड़ा। लेकिन फिर इस रणकौशलात्मक अवस्थिति से आगे बढ़कर उनका नेतृत्व सर्वहारा जनवाद की ही नयी अवरणा प्रस्तुत करने लगा और बहुदलीय संसदीय जनवादी प्रणाली और बहुदलीय प्रतिस्पध्र्दा को उसका प्रमुख आधार बताते हुए प्रकारान्तर से सोवियत और कम्यून व्यवस्था की ग्रासरूट से लेकर शीर्ष तक की सर्वहारा जनवादी प्रणाली की अपरिहार्यता को ख़ारिज करने की दक्षिणपन्थी अवस्थिति के निकट जा पहुँचा। ने.क.पा. (माओवादी) के नेतृत्व की एक विशिष्टता यह रही है कि आलोचना होने पर वह अपनी अवस्थितियों को बार-बार बदलने वाले बयान भी देता रहा है। एक दूसरी विशिष्टता यह रही है कि विगत दस वर्षों के दौरान उन्होंने अपनी कई पुरानी अवस्थितियों को बिना खुली आत्मालोचना या आत्मविश्लेषण के बदल लिया है और ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की अवस्थितियों को चुपचाप अपना लिया है। अपनी वामपन्थीग़लतियों को कोई भी पार्टी जब इस प्रकार की पैबन्दसाज़ी से या इंच-इंच पीछे खिसककर ठीक करने की कोशिश करती है तो क़तारों की राजनीतिक शिक्षा नहीं हो पाती है और पेण्डुलम के दूसरे छोर तक जा पहुँचने और पार्टी के दक्षिणपन्थी प्रैगमेटिज्मके पंककुण्ड में जा गिरने का ख़तरा पैदा हो जाता है।

ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने.क.पा. (माओवादी) की कमोबेश इसी आशय की आलोचना लगातार रखती रही है। अधिकांश मामलों में ने.क.पा. (माओवादी) ने ीरे-ीरे ने.क.पा. (एकता केन्द्र) की ही अवस्थितियों को अपना लिया है। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि रणकौशलात्मक नारे के रूप में संविधान सभा और गणतन्त्र के नारे को सबसे पहले ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ने ही आगे बढ़ाया (रणनीतिक नारे के रूप में तो यह बात 1950 से ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी)। माओवादियों ने गणतन्त्र के संस्थागत विकास का नारा दिया। एकता केन्द्र ने अन्तरिम सरकार, संविधान सभा और गणतन्त्र का नारा इस तर्क के साथ दिया कि इससे राजनीतिक प्रणाली का फैसला स्वयं जनता करेगी तथा इस नारे का साम्राज्यवादी और अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी विरोध नहीं कर सकेंगी। माओवादियों के विपरीत एकता केन्द्र निर्णायक युद्ध द्वारा केन्द्रीय सत्ता पर क़ब्ज़ा सम्भव नहीं मानती थी। बाद में माओवादी भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और क्रान्ति की दीर्घकालिकता की नयी समझ के साथ संविधान सभा, गणतन्त्र और अन्तरिम सरकार की माँग को स्वीकार कर वे सात पार्टियों के गठबन्धन के साथ समझौते की मेज़ पर आये।

चुनाव प्रणाली को लेकर ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का शुरू से ही स्टैण्ड था कि पूर्ण समानुपातिक प्रणाली से चुनाव होना चाहिए। एक महीने तक ने.क.पा. (माओवादी) इस माँग से सहमत थी, लेकिन नवम्बर में चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद उन्होंने अन्तरिम संसद से गणतन्त्र की घोषणा और पूर्ण समानुपातिक प्रणाली की माँग छोड़ दी और गठबन्धन के अन्य दलों के साथ हो लिये। लेकिन कुछ समय बाद फिर ने.क.पा. (माओवादी) के प्लेनम ने यह प्रस्ताव पारित किया कि अगर गणतन्त्र की घोषणा नहीं हुई और पूर्ण समानुपातिक प्रणाली के आधार पर चुनाव नहीं कराया गया तो उसमें वे भागीदारी नहीं करेंगे। फिर कुछ समय बाद वे कहने लगे कि जून 2007 के बाद संविधान सभा के चुनाव के लिए परिस्थिति अनुकूल नहीं रह गयी है। ने.क.पा. (एकता केन्द्र) का तब मानना था कि क्रान्तिकारी वाम के समक्ष तीन विकल्प हैं : पहला, संविधान सभा के चुनाव में भागीदारी, दूसरा, जनउभार के द्वारा क्रान्तिकारी वाम नेतृत्व में गणतन्त्र की स्थापना और तीसरा, राजनीतिक तबाही। अप्रैल 2006 का जनादेश पहले विकल्प के लिए है और परिस्थितियाँ भी इसी के लिए अनुकूल हैं। यदि साम्राज्यवादियों-प्रतिक्रियावादियों की साज़िशों से पहला विकल्प सफल नहीं हो सकेगा तो जनता इसे स्वयं समझकर दूसरे विकल्प का रास्ता पकड़ेगी। ने.क.पा. (माओवादी) भी आख़िरकार इसी निष्कर्ष पर पहुँची।


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