(नेपाल में लंबे समय से चल रही प्रक्रिया ने कल फिर एक मोड़ ले लिया है। यूएमएल द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद हालात फिर तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में फिर से नेपाल के घटनाक्रम पर निगाह टिक गई है। नेपाल के कम्युनिस्ट आंदोलन पर गहरी दृष्टि डालते इस आलेख में (मूलरूप से बिगुल में प्रकाशित) जो कि नेपाल के चुनावों के बाद लिखा गया था, और जिसे सिलसिलेवार यहां प्रकाशित किया जा रहा है, नेपाल के संशोधनवादी और क्रान्तिकारी वाम शिविर के संबंधों और ध्रुवीकरण की चर्चा की गई है। इस पूरे लेख से आज के हालातों को समझने में काफी मदद मिल सकती है।)
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नेपाल में संशोधनवादी और क्रान्तिकारी वाम शिविर और ध्रुवीकरण की जारी प्रक्रिया
अब तक की चर्चा से स्पष्ट है कि ने.क.पा. (माओवादी) और ने.क.पा. (एकता केन्द्र) ही नेपाली क्रान्तिकारी वाम शिविर की दो सर्वप्रमुख शक्तियाँ हैं। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रमुख पार्टी मोहन बिक्रम सिंह के नेतृत्व वाली ने.क.पा. (मसाल) है, जिसका जनसंगठन राष्ट्रीय जनमोर्चा है। राष्ट्रीय जनमोर्चा ने विगत चुनाव में चार सीटें हासिल की हैं। इस पार्टी की 1991 तक की चर्चा लेख में ऊपर आ चुकी है। 1990 के जनान्दोलन के समय मोहन बिक्रम सिंह नेपाली कांग्रेस के साथ सहयोग के प्रश्न पर संयुक्त वाम मोर्चा से असहमत थे। उन्होंने संविधान सभा की माँग करते हुए राजशाही के विरुध्द सशस्त्र संघर्ष पर ज़ोर दिया, लेकिन इसके लिए कभी कोई तैयारी नहीं की। 1991 के आम चुनाव का उन्होंने बहिष्कार किया, लेकिन 1994 में मध्यावधि चुनाव में हिस्सा लिया। 2002 में ने.क.पा. (मसाल) का ने.क.पा. (एकता केन्द्र) में विलय हो गया और मोहन बिक्रम सिंह ने.क.पा. (एकता केन्द्र-मसाल) के महासचिव बने। 2006 में मोहन बिक्रम सिंह सात पार्टियों के गठबन्धन में शामिल होने के विचार का विरोध करते हुए पुन: अलग हो गये। 2007 में सातवीं पार्टी कांग्रेस करके मोहन बिक्रम धड़े ने फिर से ने.क.पा. (मसाल) के तौर पर काम करना शुरू किया। मोहन बिक्रम सिंह दक्षिणपन्थी और ”वामपन्थी” अतियों के बीच अननुमेय ढंग से दोलन करते हुए आज काफ़ी हद तक अपनी साख गँवा चुके हैं। ने.क.पा. (चौथी कांग्रेस) के संस्थापक के रूप में सही विचारधारात्मक अवस्थिति अपनाकर तथा कम्युनिस्ट क़तारों की एक पीढ़ी तैयार कर उन्होंने कम्युनिस्ट आन्दोलन की जितनी महत्वपूर्ण सेवा की, उससे कहीं अधिक उन्होंने इतिहास के एकांगी मूल्यांकन की अपनी पध्दति और नौकरशाहाना संकीर्णतावादी सांगठनिक कार्यशैली के चलते नुक़सान पहुँचाया। इन दिनों दूसरे अतिवादी छोर पर खड़े होकर ने.क.पा. (माओवादी) के विरोध को उन्होंने अपना प्रमुख कार्यभार बनाया हुआ है। लेकिन दो प्रमुख पार्टियों में एकता की प्रक्रिया यदि आगे बढ़ती है तो इस पार्टी को भी देर-सबेर उस प्रक्रिया का भागीदार बनना पड़ेगा, या फिर नेतृत्व को किनारे लगाकर क़तारों का बहुलांश मुख्य धारा में शामिल हो जायेगा।
एक अन्य संगठन नेपाल मज़दूर-किसान पार्टी की ऊपर चर्चा की जा चुकी है। इस संगठन का नेतृत्व नेपाल की सामाजिक-आर्थिक संरचना में आये बदलावों के बारे में तो संजीदगी से सोचता है, लेकिन साथ ही विचारधारात्मक मामलों में दक्षिणपन्थी भटकाव का शिकार है तथा पार्टी गठन के सन्दर्भ में संकीर्ण ग्रुप-मानसिकता और अलगाववादी मानसिकता का शिकार है। इसका आधार संकीर्ण क्षेत्रीय ढंग से मुख्यत: काठमाण्डो घाटी में भक्तपुर तक सिमटा हुआ है।
क्रान्तिकारी वाम शिविर का एक अन्य संगठन ने.क.पा. (एकीकृत) है। विगत चुनाव में इस संगठन ने भी दो सीटें हासिल की थीं। इसका गठन 2007 में तीन ग्रुपों के विलय से हुआ था : ऋषि कत्ताल के नेतृत्व में ने.क.पा. (माले) (सी.पी. मैनाली) से अलग हुआ एक ग्रुप, राजबीर के नेतृत्व में ने.क.पा. (एकता केन्द्र) से अलग हुआ एक ग्रुप और सीताराम तमांग के नेतृत्व में ने.क.पा. (मालेमा-केन्द्र) से अलग हुआ एक ग्रुप।
एक अन्य कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन ने.क.पा. (मालेमा) की स्थापना 1981 में कृष्ण दास श्रेष्ठ ने की थी जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। बीच में इससे अलग होकर एक अन्य ग्रुप नन्द कुमार परसाई के नेतृत्व में नेपाल साम्यवादी पार्टी (मालेमा) बनी थी जिसका 2005 में फिर ने.क.पा. (मालेमा) के साथ विलय हो गया और ने.क.पा. (मालेमा-केन्द्र) अस्तित्व में आया। इसमें से अलग होकर सीताराम तमांग ग्रुप ने.क.पा. (एकीकृत) में शामिल हो गया। ने.क.पा. (मालेमा-केन्द्र) का मार्च 2007 में ने.क.पा. (माओवादी) में विलय हो गया।
इनके अतिरिक्त कुछ अन्य भी छोटी-छोटी क्रान्तिकारी वामपन्थी पार्टियाँ हैं जो नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में अपना विशेष स्थान या महत्व नहीं रखतीं। इनका भविष्य मुख्य पार्टियों के बीच एकता प्रक्रिया के अग्रवर्ती विकास पर निर्भर करता है।
जहाँ तक संशोधनवादी वाम शिविर की बात है, वहाँ भी ध्रुवीकरण की प्रक्रिया जारी रही है। ज़ाहिर है कि ने.क.पा. (एमाले) ही सबसे बड़ी संशोधनवादी पार्टी है। दूसरे नम्बर पर सी.पी. मैनाली के नेतृत्व वाली ने.क.पा. (माले) आती है।
1986 में सहाना प्रधान के नेतृत्व वाली ने.क.पा. (पुष्पलाल) और ने.क.पा. (मनमोहन अधिकारी) की एकता के बाद ने.क.पा. (मार्क्सवादी) के अस्तित्व में आने और फिर 1991 में ने.क.पा. (माले) के साथ उसकी एकता के बाद ने.क.पा. (एमाले) के गठन की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। पुन: 1991 में ही ने.क.पा. (एमाले) से अलग होकर प्रभुनाथ चौधरी ने ने.क.पा. (मार्क्सवादी) का गठन किया। 2005 में ने.क.पा. (युनाइटेड) के साथ इसकी एकता के बाद ने.क.पा. (युनाइटेड मार्क्सिस्ट) अस्तित्व में आया। ने.क.पा. (युनाइटेड) 1991 में विष्णु बहादुर मानन्धर के नेतृत्व वाले ने.क.पा. (डेमोक्रेटिक), ने.क.पा. (बर्मा) और ने.क.पा. (तुलसीलाल अमात्य) नामक तीन पुरानी संशोधनवादी पार्टियों के विलय से गठित हुई थी। ने.क.पा. (युनाइटेड मार्क्सिस्ट) नेपाल की तीसरी प्रमुख संशोधनवादी पार्टी है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य छोटी-छोटी संशोधनवादी पार्टियाँ भी हैं।
यदि क्रान्तिकारी वाम शिविर की मुख्य दो पार्टियों की एकता-प्रक्रिया सही दिशा में आगे बढ़ती है और यदि क्रान्तिकारी वाम वर्तमान संक्रमण काल का सही ढंग से लाभ उठाने में सफल रहता है तो निश्चय ही सत्ता का अवसरवादी खेल ज्यादा से ज्यादा नंगे रूप में खेलते हुए ने.क.पा. (एमाले) और ने.क.पा. (माले) का नेतृत्व न केवल जनता बल्कि अपनी क़तारों के सामने भी ज्यादा से ज्यादा बेनक़ाब होता चला जायेगा। इन दो संशोधनवादी पार्टियों की क़तारों में अभी भी ईमानदार आम कार्यकर्ता काफ़ी हैं, जो फिर टूटकर क्रान्तिकारियों के साथ आ खड़े होंगे। यह प्रक्रिया जनयुध्द के बारह वर्षों के दौरान और संविधान सभा के चुनाव के दौरान एक हद तक चली भी थी। आगे भी इसकी सम्भावना है।